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गुजरात: लोहे की गर्म सलाखों से दाग़ने का रिवाज

अहमदाबाद, १३ दिसम्बर: (पी टी आई) हिंदूस्तान की कुछ रियास्तों में बच्चों के ईलाज के लिए आज भी रिवायती और दक़यानूसी तरीका-ए-कार इस्तिमाल किया जाता है। यहां बच्चों के बीमार पड़ने पर रिवायती तरीक़ा ना अपनाने के लिए बेदारी के फ़ुक़दान से लो

अहमदाबाद, १३ दिसम्बर: (पी टी आई) हिंदूस्तान की कुछ रियास्तों में बच्चों के ईलाज के लिए आज भी रिवायती और दक़यानूसी तरीका-ए-कार इस्तिमाल किया जाता है। यहां बच्चों के बीमार पड़ने पर रिवायती तरीक़ा ना अपनाने के लिए बेदारी के फ़ुक़दान से लोग अब भी यही समझते हैं कि इन का रिवायती ईलाज बच्चों के लिए फ़ायदेमंद है।

गुजरात के ज़िला कुछ में वाक़्य वगाड ख़ित्ता ज़िला राजकोट के दौर दराज़ इलाक़ा में वाक़्य है जहां एक साल से लेकर पंद्रह साल की उम्र तक के बच्चों का जो मुख़्तलिफ़ बीमारीयों का शिकार हो जाते हैं ईलाज रिवायती अंदाज़ में किया जाता है जहां गर्म गिर सलाखों से उन को चरके दिए जाते हैं।

यही नहीं बल्कि उन के नाखून को बहुत ज़्यादा गर्म करदिया जाता है और अगर बत्तीयों से भी चरके लगाए जाते हैं। इस दक़यानूसी तरीक़ा-ए-इलाज के जारी रहने की वजह ये है कि इंतिज़ामीया का इस पर कोई कंट्रोल नहीं है।

इस मौक़ा पर डाक्टर राजेश जीवानी ने कहा कि सिर्फ कुछ रोज़ क़बल उन के पास एक पाँच साल मरीज़ा को लाया गया था जो सिर्फ बुख़ार से मुतास्सिर थी लेकिन डाक्टर के पास लाने से क़बल इस के इन पढ़ घर वालों ने अपना रिवायती तरीक़ा इख़तियार करते हुए पाँच साला मरीज़ा के पेट पर एक दोबार नहीं बल्कि पंद्रह बार गर्म सलाखों से चरके दिए थे।

जब घरवालों ने देखा कि लड़की की तबईत सँभलने का नाम नहीं ले रही है और इस के ज़िंदा बचने के आसार भी नहीं हैं तो उसे मेरे पास लाया गया जहां लड़की को मुकम्मल सेहतयाब करने में डाक्टर को पाँच रोज़ लग गये।

उन्हों ने कहा कि ये दकियानूस तरीक़ा यहां के कोली, भारवाड़ और मुस्लिम तबकों में आम है जिस के ख़िलाफ़ डाक्टर साहिब जद्द-ओ-जहद कर रहे हैं ताकि लोगों में बेदारी पैदा करते हुए उन्हें दक़यानूसी तरीक़ा-ए-इलाज से बाज़ रखा जाये।

गुज़श्ता 18 सालों से कम-ओ-बेश 100 मवाज़आत में ग़ैर इंसानी तरीक़ा-ए-इलाज पर अमल किया जा रहा है। क़ुरून बस्ती से ताल्लुक़ रखने वाले इस तरीक़ा-ए-इलाज का ख़ातमा इतना आसान नहीं है।

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