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गोविंदाचार्य नहीं मानते नोटबंदी से काले धन पर काबू पाया जा सकता है, जानिये क्यों?

भाजपा और संघ में अहम पदों पर रह चुके केएन गोविंदाचार्य का मानना है कि 500 और 1000 के नोट बंद करके काला धन मिटाने के लिए कोई कारगर कदम नहीं है.

केएन गोविंदाचार्य की सोशल मीडिया पर विस्तार से बताया की सरकार का नोटबंदी का फैसला कैसे कालाधन पर लगा पायेगा. पढ़िये उनकी पोस्ट का संपादित अंश

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी. पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया. नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम तीन प्रतिशत काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा. नोटों को इस प्रकार समाप्त करना- ‘खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया’ सिद्ध होगा. समझने की कोशिश करते हैं.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 20 फीसदी अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी. वहीँ 2000 के समय वह 40 प्रतिशत तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20 प्रतिशत तक पहुंची है. 2015 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना. इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है.

रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध एक रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86 प्रतिशत था. अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3 प्रतिशत होता है!अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है. इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है

प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहां है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु ( अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं. इसके अलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है. जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चुका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है. इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है. इन्हें काले धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सिखाने वाले मिल जाते हैं. इसी प्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे. 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3 प्रतिशत है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य. अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3 प्रतिशत ही बाहर आ पायेगा और 1 प्रतिशत से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा, वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं.

केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा, ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आंख में धूल झोंकना है. उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग.

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