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चीफ़ मिनिस्टर से मुहब्बत मजबूरी या मुफ़ादात की तकमील का जरया

हैदराबाद 29 जून: चीफ़ मिनिस्टर के चंद्रशेखर राव‌ के इक़तिदार में आने के बावजूद अक़लियतों खास्कर मुसलमानों का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उनकी तालीमी हालत में बेहतरी आती ना ही उनकी मआशी पसमांदगी दूर हो सकी। यहां तक कि सरकारी मुलाज़िमतों में मुसलमानों के तनासुब में किसी किस्म का इज़ाफ़ा भी नहीं हुआ। आंध्रई लॉबी ने मिल्लत की हमदर्दी का दम भरने वालों के साथ मिलकर जिन लाखों करोड़ मालियती ओक़ाफ़ी जायदादों को हड़प लिया था इन जायदाओं में से एक फ़ीसद हिस्सा भी मुसलमानों को वापिस नहीं मिल सका। हालाँकि केसीआर ने अलाहिदा रियासत तेलंगाना के लिए चलाई गई तहरीक के दौरान और फिर अलाहिदा रियासत के असेंबली इंतेख़ाबात की मुहिम के दौरान बार-बार एलान किया था कि इक़तिदार में आने पर उनकी हुकूमत मुसलमानों को तालीम और मुलाज़िमतों में 12 फ़ीसद रिजर्वेशन की फ़राहमी यक़ीनी बनाएगी।

ओक़ाफ़ी जायदादों के क़ाबज़ीन से छिड़ लिया जाएगा। ग़रज़ मुसलमानों की हमा-जिहत तरक़्क़ी के इक़दामात किए जाऐंगे। चीफ़ मिनिस्टर का कोई वादा पूरा नहीं हुआ। मुसलमानों से इस तरह की नाइंसाफ़ी पर कोई कुछ कहने वाला नहीं हर किसी को अपने मुफ़ादात की फ़िक्र लाहक़ है। मुसलमानों की हमदर्दी और उनकी हर सतह पर क़ियादत-ओ-नुमाइंदगी का दावे करने वालों की ज़बानों पर भी ताले लगे हुए हैं।

किसी में ये हमियत नहीं कि हुकूमत से ये सवाल करे कि आख़िर मुसलमानों को तालीम और मुलाज़िमतों में 12 फ़ीसद रिजर्वेशन कब दिए जाऐंगे जबकि के चंद्रशेखर राव ने असेंबली इंतेख़ाबात के दौरान एलान किया था कि इक़तिदार के मिलने के अंदरून 4 माह मुसलमानों को 12 फ़ीसद रिजर्वेशन फ़राहम किए जाऐंगे। मुसलमानों में चीफ़ मिनिस्टर चंद्रशेखर राव‌ के वादों से कहीं ज़्यादा जमात और इस के क़ाइदीन की खामोशी पर बेचैनी फैली हुई है। तक़ारीब, जलसों और निजी महफ़िलों में लोग एक दूसरे से दरयाफ़त करने लगे हैं कि आख़िर जमात के एमपी , अरकाने असेंबली और अरकान क़ानूनसाज़ कौंसिल क्युं ख़ामोश हैं अगर केसीआर 12 फ़ीसद रिजर्वेशन पर अमल आवरी को अपने वादे के मुताबिक़ इक़तिदार मिलने के अंदरून 4 माह ताय्युन बनाते थे आज लाखों मुस्लिम बच्चों को पेशावाराना कोर्सस में दाख़िले मिलते। सरकारी मुलाज़िमतों में मुसलमानों के तनासुब में इज़ाफे की राह हमवार होती। शहर और अज़ला के मुसलमानों में ये बात भी आम हो गईं हैं कि जमात और इस के क़ाइदीन बला चूँ-ओ-चरा हर मसले पर हुकूमत को हाँ मैं हाँ मिलाते जा रहे हैं एसा लगता है केउन्हें मुसलमानों के नहीं बल्ले सिर्फ और सिर्फ अपने मुफ़ादात की फ़िक्र दामन-गीर है अगर हक़ीक़त में वो एसा कर रहे हैं तो मिल्लत की ये सबसे बड़ी बद ख़िदमती होगी।

चीफ़ मिनिस्टर के दावते इफ़तार के बारे में भी मुसलमानों का यही ख़्याल है के इस तरह की दावतों , 200 मसाजिद में इफ़तार के एहतेमाम से दो लाख ग़रीब मुस्लिम ख़ानदानों में कपड़ों की तक़सीम या फिर किसी सियासी क़ाइद के मुँह में खजूर ठूंसने से मुसलमानों के मसाइल हल नहीं होते मसाइल तो अमली इक़दामात से हल होते हैं। लेकिन जमात के क़ाइदीन के ताल्लुक़ से आम तास्सुर यही है के वो भी टीआरएस के एक अहम हिस्से के तौर पर काम कर रही है उनमें और टीआरएस क़ाइदीन में सिर्फ इतना फ़र्क़ है के वो पार्टी में रह कर चीफ़ मिनिस्टर की तरफ से अदा होने वाले हर हर लफ़्ज़ की ताईद करते हैं और पार्लियामेंट-ओ-असेंब‌ली में मिल्लत की हमदर्दी का दम भरने वाले पार्टी के बाहर रह कर केसीआर और उनकी हुकूमत के फ़ैसले की ताईद-ओ-हिमायत पर मजबूर हैं।

उन लोगों की ज़बानों से केसीआर के या हुकूमत पर तन्क़ीदी अलफ़ाज़ ही नहीं निकलते अब तो शहर और रियासत में ये सवाल भी उठ रहा है के आख़िर क़ाइदीन की ख़ामोशी की वजह किया है ? उनकी अपनी क्या कमज़ोरियाँ और मुफ़ादात हैं जिसके बाइस वो मुसलमानों की बेहतर नुमाइंदगी से आजिज़ हैं ताम तास्सुर यही पाया जाता है के जमात के क़ाइदीन और केसीआर के बीच ख़ुशगवार ताल्लुक़ात हैं लेकिन एसा महसूस होता है कि ये ताल्लुक़ात एक सियासी मजबूरी और मुसलमानों से नाइंसाफ़ी पर ख़ामोशी , खु़फ़ीया समरात हासिल करने का एक ज़रीया है और ये सब कुछ मुसलमानों के मुफ़ादात को पामाल करते हुए किया जा रहा है। अगर ये ख़ुशगवार ताल्लुक़ात दो तरफ़ा होते तो मुसलमानों के कई मसाइल हल होजाते चूँकि ये ताल्लुक़ात एक तरह की मजबूरी और मुआहिदा के बराबर है मैं मुसलमानों को सिर्फ वादों के खिलोनों से बहलाया जाएगा।

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