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चुनाव आते ही यूपी में फैलाया जाता है धार्मिक उन्माद !

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उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे सियासी पारा चढ़ता जा रहा है। आए दिन नए-नए मुद्दे सामने आ रहे हैं। सभी दल अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे है।

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चाहे बात सपा की हो या बसपा की या फिर भाजपा की, ध्रुवीकरण और जातिवाद की राजनीति करने से कोई बाज़ नहीं आ रहा है। इस होड़ में सबसे आगे भाजपा है। कैराना में फर्जी पलायन का मुद्दा बना वह चुनावी मैदान में उतर चुकी है। पलायन का यह मामला यूपी में भाजपाईयों लिए संजीवनी से कम नहीं है।
अमीत शाह पलायन को अपना अस्त्र बना युपी का दंगल जीतना चाहते हैं पर जिस तरह से उसका पोल खुलता जा रहा है वह पार्टी के लिए ठीक नहीं है। वहीं इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि हिंदू बहुमत का एक बड़ा हिस्सा उस अफवाह को सही मान चुका है। गत् महीने भाजपा भारी मतों से असम की सत्ता में आई है। उसकी सबसे बड़ी वजह प्रदेश में बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठ का मुद्दा बनाना था। इसके लिए वह कई वर्षों से लगी हुई थी। उसी प्रकार से भाजपा यूपी में हिन्दू पलायन का मुद्दा बनाकर आगामी चुनाव को जीतने जुट गई है। अब सवाल ये उठता है कि विकास के नाम पर सत्ता में आई भाजपा धीरे-धीरे उससे क्यों भटकती जा रही है।
क्या विकास का यह दावा सिर्फ एक छलावा है। क्या भाजपा विकास के नाम पर आम जन को भ्रमित करके सत्ता में आई। क्या ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा सिर्फ एक झुठ था। पिछले दिनों जब भाजपा ने केन्द्र में अपने सरकार के दो वर्ष होने पर देशभर में जगह-जगह सभाएं की। सभा में उसने जिन उप्लब्धियों का गुणगान किया उसमें कितना दम था। महंगाई, बेरोजगारी और कालाधन जैसे मुद्दों पर आज वह कितनी कामयाब है।

यूपी में भाजपा रचित कैराना प्रकरण यह साबित करता है कि मोदी सरकार को अपने दो वर्ष के कार्यों पर संशय है। पिछले कई चुनाव में यह देखा गया है कि जब-जब वोटों का ध्रुवीकरन हुआ है तब-तब कमल खीला है। इसी लिए एकबार फिर भाजपा अपनी पुरानी रणनीति के तहत ही इस राज्य में चुनाव लड़ना चाहती है। यहाँ हिंदूत्व की राजनीति तो है पर अब राममंदीर जैसे मुद्दे सिरे से गायब हो गए हैं। जाहिर है भाजपा नेतृत्व अगर ‘सबका साथ-सबका विकास’ चाहता तो किसी संप्रदाय या जाति विशेष के पलायन का मुद्दा बना चुनावी ध्रुवीकरण की शुरूआत नहीं करता। बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में पलायन और विस्थापन का मुद्दा बना अखिलेश सरकार को घेरने की कोशिश करता। दुर्भाग्यवश ऐसी कोई पार्टी नहीं है जो इन मुद्दों को अपने चुनावी राजनीति का हिस्सा मानती हो। सभी अपने आधार को वापस पाने में लगे हैं पर असल मुद्दा उठाने की हिम्मत किसी में नहीं है।

इसकी एक बड़ी वजह दूसरे समूदाय की नाराज हो जाने का डर है। अकेले मुज़फ्फरनगर में 50 हजार से अधिक लोग विस्थापित जीवन बसर कर रहे हैं। वे भय और असुरक्षा के कारण अपने गाँव और घर नहीं लौटना चाहते है। लेकिन प्रदेश में उन दंगा पीड़ितों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारे देश में संप्रदायिकता सियासी जमातों के लिए ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। यह एक ऐसा शस्त्र है जिसका सहारा लेकर हमारे सियासतदाँ हमें हर बार मुख्य मुद्दों से भटकाने में कामयाब हो जाते हैं। ज़ात-पात, धर्म, क्षेत्रीयता के नाम पर वे हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। हमेशा जनता मुर्ख बनती है।

मुद्दे आज भी जस-के -तस हैं। गरीबी और बेरोजगारी मुंह बाए खड़ी है। कुपोषण को समाप्त करने के लिए हमारे पास कोई ठोस उपाय नहीं है। नौकरी और रोजगार के लिए लोगों का महानगरों की तरफ पलायन रोज-ब-रोज बढ़ता जा रहा है। आम जन के इन समस्याओं का सुध लेने वाला कोई नहीं। केंद्र में केवल और केवल संप्रदायिकता है, जो हर रोज इंसानियत को झुलसा रहा है।
लेखक -नैयर आजम
लेखक के निजी विचार है सिआसत का सहमत होना आवश्यक नही है
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