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ज़रूर पढ़ें: UP चुनाव में किसकी तरफ़ जाएगा मुसलमान वोट ?

सिआसत स्पेशल

उत्तर प्रदेश में चुनाव जब भी आते हैं ये मुद्दा ज़ुरूर सामने आता है कि मुसलमान किस पार्टी को वोट देंगे. पुराने रिकॉर्ड की बात करें तो मुसलमानों ने प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को वोट दिया है. अक्सर ये रहा है कि समाजवादी पार्टी को मुसलमानों ने ज़्यादा पसंद किया है लेकिन 2007 के चुनाव में स्थिति बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में थी. 2012 के चुनाव में तो शायद मुसलमान ने पूरी तरह से समाजवादी का साथ दिया था. पार्टी के हिसाब से अगर स्थिति समझने की कोशिश करें तो कुछ यूं है….

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बहुजन समाज पार्टी

मायावती जो बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष हैं पिछले कई सालों से एक बेहतर मुस्लिम नेता की तलाश में रही हैं लेकिन उनको इसमें कोई कामयाबी नहीं मिली है, एक बार जब आज़म ने समाजवादी पार्टी का दामन छोड़ा था तो चर्चा थी कि आज़म खान बसपा में जा सकते हैं लेकिन ये कयास सिर्फ़ कयास ही रह गए. फ़िलहाल बसपा को नसीमउद्दीन जैसे नेता से काम चलाना पड़ रहा है, नसीम उद्दीन सिद्दीक़ी को मुसलमान जानते भी नहीं, किसी तरह कोई शायद जाने भी लेकिन सम्मान कोई नहीं करता. वो अच्छे वक्ता भी नहीं हैं और आम मुसलमानों की राय में उनकी इमेज अच्छी नहीं है. मायावती की मुस्लिम राजनीति की चाबी उनके दिए जाने वाले मुसलमान उमीदवारों की लिस्ट पर निर्भर करेगी. समीकरण बना के ही मायावती मुसलमानों के वोट पा सकती हैं जैसा उन्होंने 2007 में किया था. लेकिन इस बार 2002 वाली सत्ता-विरोधी लहर नज़र नहीं आ रही है, ऐसे माहौल में बसपा सुप्रीमो क्या दाँव खेलती हैं ये आने वाला वक़्त ही बताएगा.

समाजवादी पार्टी

अगर 2017 के चुनाव की स्थिति देखें तो स्थिति कुछ साफ़ नहीं है लेकिन बड़ा हिस्सा ये मानता है कि समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के नेत्रत्व में अच्छा काम किया है, लोग आम नेताओं को तो गाली देते भी हैं लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बुराई करने वाला कोई भी इंसान ढूंढना एक मुश्किल बात हो जाती है. मुसलमानों में भी अखिलेश को लेकर यही मत है. दूसरी तरफ़ आज़म खान जैसा क़द्दावर मुस्लिम नेता होने का फ़ायदा कई बार समाजवादी पार्टी को मिल ही चुका है. पश्चिमी यूपी में आज़म का अलग ही मुक़ाम है तो पूर्वी यूपी में भी उनकी पकड़ कमज़ोर नहीं है. उनके अलावा भी पार्टी में कई मुस्लिम नेता हैं लेकिन आज़म खान `जैसा दूसरा नेता प्रदेश में मुसलमानों का कोई नहीं है. रामपुर में बनी मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना से आज़म आजकल ख़ुश भी हैं और किसी ना किसी वजह से ख़बरों में बने रहते हैं. अक्सर उन्हें लोग साम्प्रदायिक नेता मान लेते हैं लेकिन उनके क़रीबी इसे सिर्फ़ दुष्प्रचार के इलावा कुछ नहीं मानते.हालांकि पार्टी में अहमद हसन जैसे नेता भी हैं जिनकी पकड़ अपने इलाक़े में बहुत अच्छी मानी जाती है लेकिन वो अपने इलाक़े तक ही सीमित हैं, इस तरह के कई और लीडर भी हैं जो अपने ही इलाक़े तक सीमित माने जाते हैं. कुल मिला कर समाजवादी पार्टी की नैय्या आज़म खान के नाम पे टिकी हुई है और कुछ हद तक अखिलेश के काम पर.

कांग्रेस
आजकल के दौर में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति सिर्फ़ ‘सपोर्ट-स्टाफ़’ की रह गयी है उसकी वजह अगर ढूंढें तो शायद ये हो कि पार्टी के पास प्रदेश में कोई ऐसा मुस्लिम लीडर नहीं बचा है जो पार्टी को वोट दिला सके.सलमान ख़ुर्शीद और सलीम शेरवानी के नाम प्रदेश में कितने मुसलमान जानते हैं ये उँगलियों पे गिना जा सकता है. हालाँकि राहुल गाँधी का सम्मान मुस्लिम कम्युनिटी में काफ़ी किया जाता है और एक सभ्य नेता की छवि का फ़ायदा पार्टी को कुछ सीटों पर मिल सकता है लेकिन बहुत उम्मीद रखना सिवाय बेमानी के कुछ नहीं होगा.

AIMIM

असदउद्दीन ओवैसी की हैदराबादी पार्टी आल-इंडिया इत्तिहादुल-मुस्लिमीन ने जिस तरह से अलग अलग प्रदेशों में अपने पैर जमाना शुरू किया है इससे उत्तर प्रदेश में भी पार्टियां डरी हुई हैं और ख़ास तौर से वो जिनको मुसलमानों के अच्छे वोट मिल जाते हैं.”जय-मीम,जय-भीम” के नारे के साथ ओवैसी इस बार के चुनाव में बड़ा रोल प्ले करने की बात कर रहे हैं. साथ ही ओवैसी अन्दर अन्दर मायावती से गठबंधन की बात भी कर रहे हैं. जहाँ तक आम मुसलमान की बात है तो ओवैसी को पसंद करने वाले लोग अच्छी ख़ासी तादाद में हैं लेकिन ये लोग वोट में बदलेंगे या नहीं ये कहना मुश्किल है और ये भी है कि ओवैसी को पसंद करने वाले ज़्यादातर युवा हैं जो उनमें एक उम्मीद देखते हैं लेकिन ओवैसी को नापसंद करने वाले भी अच्छी तादाद में हैं. हालांकि कुछ युवा मुसलमान का मानना है कि ओवैसी ने मुसलमानों को आवाज़ दी है लेकिन पार्टी की बुनियाद राज्य में ज़्यादा मज़बूत नहीं है और इस बात का नुक़सान पार्टी को हो सकता है.

बीजेपी
बीजेपी कितना ही दावा कर ले कि वो सबको साथ लेके चलती है, प्रधानमंत्री मोदी कितनी ही मेल-जोल की बातें करें लेकिन जिस तरह की नफ़रत की बातें बीजेपी के नेताओं ने पिछले दिनों की हैं उसके बाद से मुसलमानों में इस पार्टी के लिए ग़ुस्सा बढ़ा ही है. हालांकि पहले भी बीजेपी को वोट देने वाले मुसलमान बहुत कम ही होते रहे हैं लेकिन इस बार हाल उससे बुरा नहीं हुआ तो बेहतर तो हो ही नहीं सकता. पार्टी में ना तो कोई मुस्लिम नेता है और ना ही बीजेपी मुसलमानों को टिकेट देती है. जिन मुस्लिम नेताओं को बीजेपी सामने लाती भी है उन्हें बीजेपी ख़ुद भी मुसलमान नहीं मानती. बीजेपी ने कभी मुसलमानों का कोई काम भी नहीं किया है जिससे मुसलमान ख़ुश होते उलटे बीजेपी सरकार में मुसलमानों पे हमले होने लगते हैं और आम मुसलमान इन्हें दंगाई पार्टी का तमगा देता है. मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बात करने वाले नेताओं की पार्टी को शायद ही कोई मुसलमान वोट देगा.

पीस पार्टी

वोट कटुवा पार्टी के नाम से जानी जाने वाली पीस पार्टी ने 2012 में चार सीटों की जगह हासिल की थी लेकिन इस बार ओवैसी के उत्तर प्रदेश चुनाव में उतरने से स्थिति नाज़ुक बन गयी है. ख़बरों में ये भी है कि पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लगभग आख़िरी दौर में है, अगर ऐसा होता है तो पार्टी को फ़ायदा हो सकता है.

(सियासत हिंदी स्पेशल)

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