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जगजीत सिंह की आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामुश होगई

दुनिया भर में जदीद ग़ज़ल गायकी की तवाना और मज़बूत आवाज़ जगजीत सिंह आज पिर की सुबह अपने करोड़ों चाहने वालों को ग़मगींन छोड़कर हमेशा के लिए ख़ामोश होगई। वो गुज़श्ता तीन हफ़्तों से ज़िंदगी और मौत की कश्मकश में मुबतला थे। उन्हें दिमाग़ की रग फ

दुनिया भर में जदीद ग़ज़ल गायकी की तवाना और मज़बूत आवाज़ जगजीत सिंह आज पिर की सुबह अपने करोड़ों चाहने वालों को ग़मगींन छोड़कर हमेशा के लिए ख़ामोश होगई। वो गुज़श्ता तीन हफ़्तों से ज़िंदगी और मौत की कश्मकश में मुबतला थे। उन्हें दिमाग़ की रग फटने के बाद क़ौमे की हालत में मुंबई के राम लीला हस्पताल में मुंतक़िल किया गया था, जहां उन्हें इंतिहाई निगहदाशत के शोबे में रखा गया था।ग़ज़ल गायकी के बादशाह कहलाने वाले जगजीत सिंह अपने क्लास की उस्लूब और गरजदार लहजे की वजह से ग़ज़ल की नई जिहतों के अमीन समझे जाते थे। ग़ज़ल गायकी शायरी के बरताओ की एक ऐसी क़सम है, जिस का आग़ाज़ मशरिक़े वुसता में हुआ और बारहवीं सदी में ये हिंदूस्तान पहुंची, जहां उसे नए ढब से अपनाया गया। जगजीत सिंह को जदीद ग़ज़ल गायकी का एक ताबिंदा सितारा इस लिए भी गरदाना जाता है, क्यों कि वो पहले हिनदुसतानि गुलूकार थे, जिन्हों ने 1970 और 1980 की दहाई में ग़ज़ल गायकी में मशरिक़ी आलात मूसीक़ी के साथ साथ मग़रिबी साज़ों के इस्तिमाल का आग़ाज़ भी किया। बर्र-ए-सग़ीर में ग़ज़ल गायकी की मक़बूलियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है किहिनदुसतानिऔर पाकिस्तानी फिल्मों में भी ग़ज़लों को शामिल किया गया। जगजीत सिंह ने भी बॉलीवुड के लिए मुतअद्दिद ग़ज़लें गाईं, जिन्हें बहुत शौहरत मिली। जगजीत सिंह की पहचान बनाने में 1981 मैं फ़िल्म प्रेम गीत और इस के बाद फ़िल्म अर्थ में उन के गीतों ने बहुत अहम किरदार अदा किया। 1941ए- में पंजाब में पैदा होने वाले जगजीत सिंह बुलंद फ़िशार ख़ून या हाई ब्लड प्रैशर के मरीज़ थे और डाक्टरों के मुताबिक़ उन की दिमाग़ की रग फटने की वजह भी यही बीमारी बनी। 1998 मैं उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा था और इस के बाद उन्हों ने सिगरेट नोशी तर्क कर दी थी। जिस शाम जगजीत सिंह को हस्पताल मुंतक़िल किया गया इस रोज़ वो और ग़ज़ल गायकी के पाकिस्तानी लीजैंड ग़ुलाम अली एक साथ एक महफ़िल में अपने फ़न का मुज़ाहरा करने वाले थे। ये मूसीक़ी की तक़रीब वसती मुंबई के ज़िला मोटनगा के मशहूर शान मखनड हाल में रखी गई थी, जिसे जगजीत सिंह की अलालत के बाइस मंसूख़ कर दिया गया। मशहूर गुलूकार जगजीत सिंह ग़ज़ल गायकी में अपनी पुरसोज़ आवाज़ का इस्तिमाल बहुत उम्दगी से करते रहे हैं। वो ग़ज़ल को सादा अंदाज़ में मितानत के साथ गाने का चलन रखते थे लेकिन पिछली एक दहाई से वो मुहाफ़िल मूसीक़ी में रागदारी और लयकारी का भी इस्तिमाल ग़ैरमामूली अंदाज़ में करने लगे थे। इस के साथ साथ वो ग़ज़ल के लिए मौज़ूं राग के शुद्ध सुरों के उतार चढ़ाओ या बरता वेको भी अब अपनी गायकी का हिस्सा बनाने लगे थे। जगजीत सिंह को 2003 मैं आलाहिनदुसतानितमगे पद्म भूषण से नवाज़ा गया था। वो गुलूकारी के इलावा म्यूज़िक कंपोज़र और डायरेक्टर भी थे। वो उर्दू और पंजाबी के इलावा कुछ औरहिनदुसतानिज़बानों में भी गायकी में महारत रखते हैं। इन की वाहिद औलाद उन के बेटे वीवक सिंह थे, जो 90 की दहाई के अवाइल में एक हादिसे में हलाक हो गए थे।

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