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जन्मदिन: अज़ीम शायर हसरत मोहानी जिन्होंने सब से पहले इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था

नई दिल्ली: मौलाना हसरत मोहानी:(1 जनवरी 1875 – 1 मई 1951) साहित्यकार, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान, समाजसेवक और “इन्कलाब ज़िन्दाबाद” का नारा देने वाले आज़ादी के सिपाही थे.
भारत को” इंकलाब जिंदाबाद” का नारा देकर अंग्रेजों से लड़ने का हौसला देने वाले हसरत मोहानी का आज जन्मदिन है. हसरत मोहानी का शख्सियत बहुआयामी थी. मौलाना हसरत मोहानी जो एक उर्दू शायर, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता सेनानी तथा संविधान सभा के सदस्य थे. हर विधा में उनका बेशकीमती योगदान था. वह क़स्बा मोहान ज़िला उन्नाव में 1875 को पैदा हुए.हिन्दुस्तान की आज़ादी के सबसे मशहूर नारों में से एक ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा 1921 में उन्होंने दिया जिसे बाद में शहीद भगत सिंह ने मशहूर किया. वो भारत कम्युनिस्ट पार्टी के फाउंडर-मेंबर भी थे. 13 मई 1951 को लखनऊ में उनका देहांत हो गया.

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1903 में अलीगढ़ से बीए किया. शुरू ही से उन्हें शायरी का ज़ौक़ था औरअपना कलाम तसनीम लखनवी को दिखाने लगे. 1903 में अलीगढ़ से एक रिसाला उर्दूए मुअल्ला जारी किया. इसी दौरान शाराए मुतक़द्दिमीन के दीवानों का इंतिख़ाब करना शुरू किया. स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लेते रहे. 1907 में एक मज़मून प्रकाशित करने पर वह जेल भेज दिए गए.

आज भी हिंदी फिल्म ‘निकाह’ में प्रसिद्ध गायक गुलाम अली द्वारा गाई गई लोकप्रिय गजल ‘चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है’ लोगों को याद होगी. इसके बोल भी आज भी लोगों के ज़हन से नहीं गये होंगे.
मौलाना हसरत मोहानी के जीवन पर एक टी.वी. धारावाहिक के सह-निर्देशक, पटकथा तथा संवाद लेखक एम. सैयद आलम कहते हैं कि बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी मौलाना हसरत मोहानी के साथ इतिहास ने शायद इंसाफ नहीं किया. वह महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, पंडित नेहरू तथा सरदार पटेल से पहले के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ थे.
उनकी जिंदगी शायरी के दायरे में नहीं फंसी थी. देश की आजादी के संघर्ष के दिनों उन्होंने खुल कर इसमें भाग लिया. वह बाल गंगाधर तिलक के अनुयायी थे. उन्हें 1903 में जेल जाना पड़ा. उस वक्त राजनीतिक कैदियों के साथ भी सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता था और उन्हें शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता था. 1904 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली.
मौलाना हसरत मोहानी मोहम्मडन एंगलो ओरिएंटल कालेज के पहले छात्र थे जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के चलते उस कालेज से निकाला गया था. यही कालेज आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना.

उनकी कुछ मशहूर चुंनिंदा शायरी

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्क-ए-उल्फत पर वो क्योंकर याद आते हैं

ना छेड़ ऐ हमनशीं कैफिअत-ए-सहबा के अफ़साने
शराब-ए-बेखुदी के मुझ को सागर याद आते हैं

रहा करते हैं कैद-ए-होश में ऐ वाये नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद फरामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उनकी महीनों भर नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हकीकत खुल गयी ‘हसरत’ तेरे तर्क-ए-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं

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