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जन्मदिन विशेष: एक बहु आयामी वयक्तित्व, जाहिदा जैदी जिन्होंने उर्दू अदब के हर पहलू को छुआ

नई दिल्ली: (4 जनवरी 1930–11 जनवरी 2011) एक विद्वान, कवि, नाटक कार और साहित्यिक आलोचक जाहिदा जैदी 4 जनवरी 1930 को मेरठ में पैदा हुई थी. वह पांच बहनों में सब से छोटी थी. प्रतिष्ठित महान उर्दू शायर ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली उनके नाना थे. जबकि पिता एस.एम. मुस्तहसिन जैदी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित पढाते थे.

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जाहिदा जैदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में योगदान देने से पहले लेडी इरविन कॉलेज और मिरांडा हाउस दिल्ली विश्वविद्यालय में भी व्याख्याता के रूप में काम किया था. एक जाने-माने कवि, प्रोफेसर जैदी ने उर्दू और अंग्रेजी में 30 से ज्यादा किताबें लिखीं जिन में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक मुद्दों को कवर किया. इस के अलावे उनहोंने विख्यात साहित्यिक रचना Chekhov, Pirandello, Beckett, Sartre और Ionesco का अनुवाद किया. उनहोंने एक निपुण नाटककार की तरह अंग्रेजी और उर्दू दोनों में कई पश्चिमी और भारतीय नाटककारों के नाटकों का निर्देशन और संपादन भी किया. 11 जनवरी 2011 को अलीगढ़ में आखिरी सांस ली.
उर्दू नाटक के लिए उन्हें गालिब संस्थान,दिल्ली, द्वारा हम सब ग़ालिब पुरस्कार और कुल हिंद बहादुर शाह जफर अवार्ड से सम्मानित किया गया.
उन के कुछ शेर देखें :-
क़तरा-ए-आब को कब तक मरी धरती तरसे

तख़्ईल का दर खोले हुए शाम खड़ी है

बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है

मारा हमें इस दौर की आसाँ-तलबी ने

वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

सिवा है हद से अब एहसास की गिरानी भी

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