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जन्मदिन विशेष: कैफ़ी आज़मी जिन्होंने उर्दू अदब के साथ हिंदी सिनेमा का नाम भी रोशन किया

नई दिल्ली: सैयद हुसैन रिजवी नाम और कैफ़ी तखल्लुस था. 14 जनवरी 1923 ई को जिला आजमगढ़ के मौजा मजवां में पैदा हुए. दबीर माहिर, दबीर कामिल, आलिम (लखनऊ विश्वविद्यालय) मुंशी, मुंशी कामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डिग्रियां प्राप्त की. उनहोंने अपने अदबी सफ़र की शुरुआत एक ग़ज़ल गो के रूप में किया. उनकी शायरी यात्रा का दूसरा दौर क्रांतिकारी रूप में सामने आया. कैफ़ी आजमी मुख्य रूप से नज़्म के कवि थे, ग़ज़ल के नहीं.

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19 वर्ष की आयू में आज़मी साहब कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए जिस से वह अंतिम समय तक जुड़े रहे. 1943 में मुंबई आ गए और फिल्मी गीतकार की हैसियत से उन्हें काफी लोकप्रियता हासिल हुई. भारत सरकार के सर्वोच्च अवार्ड ”पदम श्री ” कैफ़ी आज़मी को साहित्यिक सेवाओं के बदले में 1973 में दिया गया जो बाद में उन्होंने उर्दू के खिलाफ भारत सरकार के भेद-भाव पूर्ण रवैये पर विरोधस्वरूप वापस कर दिया.

फिल्मों में आजमी का काम एक गीतकार, लेखक और अभिनेता के रूप में शामिल है. आजमी ने अपना पहला गाना शहीद लतीफ द्वारा निर्देशित, फिल्म ‘बुजदिल’ में गया था जिसकी संगीत सचिन देव बर्मन द्वारा दी गई थी, जो 1951 में परदे पर आई. उनकी प्रारंभिक पहचान एक लेखक के रूप में यहूदी की बेटी (1956), परवीन (1957), मिस पंजाब मेल(1958) और ईद का चांद (1958) से मिली.

ख्वाजा अहमद अब्बास और बिमल रॉय जैसे निर्देशकों ने फिल्म जगत को “नया सिनेमा’ के रूप में ढालने की कोशिश की, जिस के लिए साहिर लुधियानवी, जान निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, और कैफी आज़मी जैसे लेखकों ने हिंदी फिल्म गीत को एक नया आयाम दिया. हिंदी गीतों में एक ताजा नई लहर पैदा कर दी जिस से गीत के बोल अमर हो गए.
चेतन आनंद की फिल्म हीर रांझा (1970) में कैफ़ी आज़मी ने पूरी फिल्म के डायलॉग ही कविता में लिख डाली. जो एक जबरदस्त उपलब्धि और हिंदी फिल्म लेखन की सबसे बड़े कारनामों में से एक था. आजमी ने बहुत सी हिंदी फिल्मों के गाने लिखे जो सदा के लिए अमर हो गए. कुछ फिल्मों के नाम आप को बता दें ताकि आज़मी साहब की खुदा दाद सलाहियतों का आप अंदाजा लगा सकें. एमएस सथ्यू की गरम हवा (1973), इस्मत चुग़ताई द्वारा लिखी कहानी पर आधारित है. श्याम बेनेगल की मंथन (1976) और सथ्यू के कन्नेश्वारा रामा (1977) के लिए संवाद लिखे. गुरु दत्त की फिल्म काग़ज़ के फूल (1959) और चेतन आनंद की फिल्म हकीक़त (1964), भारत की सबसे यादगार फिल्म के लिए आज़मी को याद किया जाएगा. कोहरा (1964), अनुपमा (1966), उसकी कहानी (1966), सात हिंदुस्तानी (1969), शोला और शबनम, परवाना (1971), बावर्ची (1972), पाकीज़ा (1972) शामिल हैं. हँसते ज़ख्म (1973), अर्थ (1982) और रजिया सुल्तान (1983), नौनिहाल (1967 उनकी यादगार फ़िल्में हैं जिनके के गाने आज भी गूंजते हैं.

मोहम्मद रफी द्वारा गाया गीत ‘मेरी आवाज सुनो प्यार का राज सुनो’ कैफ़ी आज़मी ने ही लिखा था, वह गीत भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की शवयात्रा के ऊपर फिल्माया गया था. 10 मई 2002 को मुंबई में हमेशा के लिए इस संसार से विदा हो गए.

उनकी पुस्तकों के नाम हैं: ‘झंकार’, ‘आखिर शब’, ‘आवारा सजदे’, ‘नया गुलिस्ताँ’, और ‘मेरी आवाज सुनो’ (फ़िल्मी गीतों का पूरा काम).

कैफ़ी आज़मी को उनके बेहतरीन काम के लिए बहुत से अवार्ड भी मिले, देखें:-
साहित्य अकादमी पुरस्कार:-
1975: साहित्य अकादमी पुरस्कार: आवारा सजदे के लिए
2002: साहित्य अकादमी फैलोशिप
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार:-
1970: राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड, सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए (सात हिंदुस्तानी)
फिल्मफेयर पुरस्कार:-
1975: फिल्मफेयर अवार्ड, सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए (गरम हवा)
1975: फिल्मफेयर अवार्ड, सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए (गरम हवा) शमा जैदी के साथ.

उनका एक ग़ज़ल देखें:-

मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

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