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जन्मदिन विशेष: पैगाम आफाकी जिन्होंने उर्दू अदब में उपन्यास को नई बुलंदी अता की

नई दिल्ली: पैगाम आफाकी जिसे उर्दू अदब में अख्तर अली फारूकी के नाम से भी जाना जाता है. उर्दू उपन्यास और लघु कहानियों के लिए उनका नाम विशेष रूप से लिया जाता है.
पैगाम आफाकी बिहार के सीवान जिले में एक किसान परिवार में 10 जनवरी 956 को पैदा हुए. उन्होंने अपने गृह नगर से अपनी स्कूली शिक्षा हासिल की थी, और उनहोंने बीए ऑनर्स (अंग्रेजी साहित्य) और एमए (इतिहास) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से किया. वह 1976 में भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में बैठे और दिल्ली पुलिस में विभिन्न महत्वपूर्ण कार्य किया और पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में भीकाम किया.

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स्कूल के ज़माने से ही उन की कविताएँ कुछ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे. विश्वविद्यालय में रहते हुए उनकी छोटी कहानियां और कविताएँ आहंग , तहरीक, आजकल और अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गए थे. वह 1975-76 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की साहित्यिक सोसाईटी के सचिव भी रहे और छात्रों के बीच उपन्यास लेखन को बढावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
एक लेखक के रूप में पैगाम आफाकी का नाम 1989 में उनके उपन्यास ‘मकान’ के प्रकाशन के बाद लोगों के बीच चर्चित हुए. मकान को उर्दू और अंग्रेजी में काफी लोकप्रियता मिली. उनके दो अन्य पुस्तकें ‘माफिया’, लघु कहानियों का संग्रह और ‘दरिंदा’ कविताओं का संग्रह भी प्रकाशित किया गया.

उनके उपन्यास ‘मकान’ पैगाम आफाकी को भारत में सबसे लोकप्रिय लेखक की श्रेणी में ला खड़ा किया. यह उपन्यास अंग्रेजी में भी बेहद लोकप्रिय हुआ. ‘मकान’ के प्रकाशन के बाद उर्दू अदब में एक नया आयाम जुड़ गया, उर्दू अदब किस्सा कहानियों से बहार नक़ल कर एक रचनात्मक सोच में बदलने लगा. इसे एक अभूतपूर्व कामयाबी के रूप में देखा गया. ‘माकन’ ने उर्दू अदब में उपन्यास को एक नई बुलंदी अता की.

1990 में उन्होंने फिक्शन इंडियन एकेडमी की स्थापना की. 1994 में वह एक टीवी सीरियल बनाने में लग गए जिसमें वह खुद टीवी फिल्म निर्माण और कई अन्य टीवी कार्यक्रमों के निर्माण से भी जुड़े. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मास मीडिया के छात्रों को फिल्म बनाने के लिए जोर दिया. 1996 में वह स्क्रिप्ट लिखने के लिए सॉफ्टवेयर विकसित किया और पटकथा हाउस की स्थापना की.

1994-95 में वह क्रिसेंट एजुकेशन सोसाइटी दिल्ली में सचिव रहे. 1997 में वह एएमयू ओल्ड ब्वॉय एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी रहे. उनहोंने आल इंडिया रडियो के कार्य कर्मों में भी भाग लिया.
20 अगस्त 2016 को वह इस दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह कर चले गए.

उन्हें कई तरह के अवार्ड से भी सम्मानित किया गयाहै. जैसे:-
फिरोज गांधी मेमोरियल अवार्ड:
उर्दू अकादमी: यूपी किताब के लिए प्रथम पुरस्कार
उर्दू अकादमी: दिल्ली सरकार
मिलेनियम अवार्ड: जामिया उर्दू, अलीगढ़

निम्नलिखित उनकी यादगार पुस्तकें है;

उपन्यास ‘मकान’
उपन्यास ‘पलीता’
लघु कथाएँ ‘माफिया’
काव्य ‘दरिंदा’

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