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जन्मदिन विशेष: बिहार के महान शायर शाद अज़ीमाबादी, जिसे अपने युग का ‘मीर’ कहा गया

पटना: पूरा नाम सैयद अली मोहम्मद, “शाद” तखल्लुस, (7जनवरी 1846-8 जनवरी 1927) अजीमाबाद यानि पटना में 7 जनवरी 1846 ई को पैदा हुए. शाद बिहार की सरज़मीन का ऐसा चमकता हुआ सितारा था जिस ने उर्दू अदब में न केवल बिहार का नाम बल्की पुरे देश का नाम रौशन किया. शाद ने अमीरी और रियासती शान व शौकत में आंख खोली. अरबी, फारसी और दीनीयात की शिक्षा योग्य शिक्षकों से प्राप्त की.

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शाद अज़ीमाबादी इस्लाम के साथ साथ अन्य धर्मों का भी अध्यन किया. मानवता उन के अन्दर कूट कूट कर भरी हुई थी. शायरी में उल्फत हुसैन फरियाद अज़ीम आबादी की शागिर्दी में इस्लाह हासिल की. उनहोंने कुछ ग़ज़लों में सफीर बलगरामी की भी इस्लाह ली. मीर अनीस और मिर्जा दबीर की सुहबतों से भी बहुत फ़ैज़याब हुए. शाद अंग्रेजी और हिंदी भाषा भी जानते थे. उनका ननिहाल पानीपत था. एक बार वे वहां गए और हाली से मुलाकात की. अलीगढ़ भी गए और सर सैयद से भी मुलाकात हुई.
उनके साथ विडंबना यह रही कि उनके एक हिन्दू दीवान और कोषाध्यक्ष ने उनके राज्य और जागीर का बड़ा हिस्सा बेच दिया और रुपया हड़प लिया. जो हजारों और लाखों में खेलता था उसे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में केवल एक हज़ार रुपया मासिक सहायता पर गुजर-बसर करनी पड़ी. शाद कई साल तक पटना में मजिस्ट्रेट रहे. उनकी साहित्यिक सेवाओं के बदले में सरकार से ” खान बहादुर ” का खिताब मिला. ” मयखाना इल्हाम” के नाम से उनका दीवान छप गया है. मर्सिया, रुबायात, मसनवी और नसर की कई किताबें उनकी यादगार हैं. शाद को अपने युग का मीर कहा गया है.
शाद ने उर्दू अदब के हर पहलू पर काम किया. क़सीदा, मर्सिया, मसनवी, कतआ , रुबाई और ग़ज़ल सभी शैलियों पर उन का कलाम मौजूद है. ग़ज़ल आपको बहुत प्रिय था. शाद अजीमाबादी बिहार के सबसे सफल कवि हैं. आलोचकों ने भी उनकी कविता की सराहना की है.
उनकी मशहूर किताबें “फरोग हस्ती” 1857 में, “कुल्लियाते शाद” 1975 में और “रुबाइयात” बेहद लोकप्रिय रहीं.
8 जनवरी 1927 को पटना में उनका निधन हो गया.
उनका एक ग़ज़ल देखें:-

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था
न अपने जिस्म में हम थे न तू था

हर इक के पाँव पर झुकते कटी उम्र
न समझे हम कि किस क़ालिब में तू था

जहाँ पहुँचे उसी का नूर पाया
जिधर देखा वही ख़ुर्शीद-रू था

जगह दामन में अपने क्यूँ न देते
कि तिफ़्ल-ए-अश्क अपना ही लहू था

लबालब जाम था हम थे सुबू था
सज़ा लग़्ज़िश की पाते बज़्म में हम
ख़ुदा को ख़ैर करना था कि तू था

हम अपने होश में बाक़ी थे हर तरह
मगर जब तू हमारे रू-ब-रू था

तुझी से मुँह फुला लेते अजब क्या
सबा ग़ुंचों का भी आख़िर नुमू था

चले हम बाग़ से ऐ ‘शाद’ किस वक़्त
बहार आने को थी गुल का नुमू था

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