Friday , September 22 2017
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जब आसपास कत्लेआम हो रहे हो तो ईद की ख़ुशी कैसे मनाई जाए

“खिज़ां में मुझको रुलाती है याद-ए-फ़स्ल-ए-बहार
ख़ुशी हो ईद की क्योंकर के सोगवार हूं मैं”

“शरजील ईमाम, मेरे भाई, ये क्या बात है कि आज ईद के दिन, यानी ख़ुशी के दिन तुम सोगवार हो? तुमको किस बात का ग़म है जिसका इज़हार अल्लामा इक़बाल के शेर के ज़रिये से कर रहे हो?”

“साकिब सलीम, तुम मुझसे पूछ रहे हो? यानी मुझसे? क्या तुम ख़ुद नहीं जानते? क्या तुमने अपने आसपास हो रहे क़त्ल-ए-आम से नज़र मूंद रखी हैं?”

“साकिब, मेरे दोस्त, क्या तुम ये भूल गए हो की नजीब जो हमारे ही हॉस्टल में रहता था अब तक लापता है? तुम ये कैसे बर्दाश्त कर पाओगे के तुम नये कपड़े पहन कर खुशियों के गीत गाओ जबके नजीब की मां की आंखें बेटे की राह में पत्थर हो रही हों? तुम तो ये भी नहीं सोच पा रहे कि पहलू खान के घर में ईद किस मातम के बीच गुज़रेगी? ज़रा सोचो जुनैद के उस भाई का हाल जिसके सामने ईद की खरीददारी कर लौट रहे उसके भाई को चाकुओं से गोद कर भीड़ ने मार डाला। जुनैद का जुर्म उसके नाम के सिवा शायद कुछ न था। ऐसे ही न जाने कितने लोगों को इस खून की प्यासी भीड़ ने झूठी अफवाहों के सहारे मार डाला। क्या तुमको ये सब नहीं दिखता?”

“तो तुम क्या कहना चाहते हो कि ईद जो कि मुसलमानों का त्योहार है वो हम न मनाएं?”

“तुमको याद होगा बचपन में स्कूल में हम एक शपथ लेते थे की सभी भारतीय हमारे भाई या बहन हैं। क्या तुम वो शपथ भूल गए? अच्छा चलो तुमने ये तो सुना होगा कि एक मुसलमान दुसरे मुसलमान का भाई या बहन होता है। दोनों में एक रिश्ता तो मानो मेरे भाई।”

“हां, मैं दोनों ही रिश्ते मानता हूं।”

“तो फिर ये कैसे कि तुम्हारा भाई नजीब लापता है, तुम्हारे जुनैद, पहलू, जैसे भाई मौत के घाट उतार दिए जाते हैं और तुम ईद पर नये कपड़े पहन कर ख़ुशी मनाते हो? क्या घर के किसी सदस्य की मौत के बाद तुम तीज त्योहार उसी धूमधाम से मनाते हो? बताओ, जवाब दो।”

“शरजील भाई तुम्हारी बात एकदम सही है पर अगर ये ग़म सच है तो हम लोग आज तक ईद की खुशियां कैसे मनाते चले आ रहे हैं। इस तरह तो तुम्हारी और मेरी और हम सबकी सारी ईदें इंसानियत और भाईचारे की लाशों पर मनी हैं। देखो मैं तुमको समझा रहा हूं, सब भारतीयों को अपना भाई न मानो, हर मुसलमान को अपने परिवार का हिस्सा न जानो, वरना तुम ख़ुद को मुजरिम से ज़्यादा कुछ न पाओगे।”

“ये तुम क्या बक रहे हो। तुम मुझे भाईचारा न मानने का पाठ दे रहे हो?”

“मैं तुमको कोई पाठ नहीं दे रहा। पाठ देने वाला मैं होता भी कौन हूं, न मैं नेता, न पुजारी, न मौलवी। मैं तो बस ये बता रहा हूं कि तुमने आज से पहले कभी इन मुसलमानों को अपना भाई नहीं जाना। पिछले सत्तर सालों में तो कभी नहीं। फिर अचानक अब क्यों ईमान लाते हो? अच्छा शरजील भाई एक बात बताओ। मान लो तुम्हारे घर से, ख़ानदान से, मुहल्ले से, तीन सौ लोगों को एक ही दिन मौत के घाट उतार दिया जाये तो तुम क्या करोगे? क्या उस दिन को आने वाले बरसों तक एक अत्याचार या ज़ुल्म के दिन के तौर पर याद रखोगे या उस दिन आने वाले बरसों में अपनी रोज़ मर्रा की खुशियां मनाते हुए उन तीन सौ लोगों का ज़िक्र भी करना याद न रखोगे।”

“ये क्या बेतुका सवाल है? बेशक मैं उस दिन को कोई भी ख़ुशी चाह कर भी न मना पाऊंगा। साक़िब आख़िर तुम साबित क्या करना चाहते हो, साफ़ साफ़ क्यों नहीं बोलते?”

“मेरे भाई तब तुम अपनी आत्मा के कान खोलकर सुनो। 13 अगस्त, 1980 का दिन था। मुसलमान सुबह से ईद की तैयारियों में लगे हुए थे। मुरादाबाद, जो कि उत्तर प्रदेश का एक शहर है, वहां भी मुसलमान सुबह-सुबह ईद की नमाज़ अदा करने ईदगाह पहुंचे। पर उनमें से बहुत से लोग ये नहीं जानते थे की ये उनकी आखिरी नमाज़ होगी। ईदगाह में चालीस हज़ार से ज़्यादा मुसलमानों पर, जिनमें कि बच्चे भी शामिल थे, पुलिस ने गोलियां बरसाई और तीन सौ के क़रीब लोगों को मार डाला।

मोदी सरकार में मंत्री एम जे अकबर, जो की तब मुरादाबाद से रिपोर्टिंग कर रहे थे, अपनी किताब में लिखते हैं, “प्रोविंशियल आर्मड कांस्टेबुलरी (पीएसी) ने 40,000 मुसलमानों पर ईदगाह में फायरिंग की। इसमें कितने लोग मारे गये इसका सही आंकड़ा नहीं पता पर ये ज़रूर पता है की ये एक हिन्दू-मुस्लिम दंगा नहीं था। ये एक साम्प्रदायिक पुलिस द्वारा किया गया निहत्थे मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम था।”

उस समय के लोक सभा सांसद सैय्यद शहाबुद्दीन ने इस फायरिंग की तुलना जलियावाला बाग़ से की थी। ध्यान रखियेगा की दोनों में बहुत समानताएं हैं। जलियांवाला बाग़ में लोग बैसाखी के त्यौहार पर इकठ्ठा हुए थे और यहां ईद पर। दोनों ही जगह तीन ओर दीवारों से घिरी हुई थीं और आने जाने के एकलौते रास्ते से फायरिंग की गयी थी। और दोनों में सैकड़ों लोग मारे गए थे।

अकबर लिखते हैं की पुलिस ने बाद में इसको हिन्दू-मुस्लिम दंगों का नाम दिया जबके सच इसके उलट था। पुलिस के जो चार सिपाही हिंसा में मारे गए वो ईदगाह पर फायरिंग होने के बाद तब मारे गए जब गुस्साई भीड़ ने पुलिस चौकी पर हमला किया। उसमें भी इस भीड़ ने रास्ते में किसी हिन्दू के घर या दूकान को नहीं छुआ था। पुलिस ने बिना किसी कारण निहत्थी जनता पर गोली चलायी और 300 जान ले ली जिसमें कई बच्चे भी शामिल थे।

मुसलमानों का खून बहाना ही काफ़ी न था। कांग्रेस जो की तब सरकार में थी और वामपंथी जो की मीडिया पर कब्ज़ा किये हुए थे, मुसलमानों को ही उनकी अपनी मौत का ज़िम्मेदार ठहराने में लग गए थे। मशहूर वामपंथी लेखक रोमेश थापर, जो के रोमिला थापर के भाई भी हैं, को ये लिखते हुए ज़रा भी शर्म नहीं आयी के मुसलमान ही हथियार बंद हो कर नमाज़ पढने जाते हैं और पुलिस ने सिर्फ़ अपना फ़र्ज़ पूरा किया था।

अब ये तो वही बता सकते थे के पुलिस के सामने ऐसी क्या मजबूरी रही होगी के उसने नमाज़ पढ़ते लोगों पर गोलियां चला दी जबकि दूसरी ओर कोई जान का नुकसान नहीं हुआ था। अकबर लिखते हैं की अगर मुसलमान हथियारबंद थे तो भगदड़ के बाद कोई हथियार या कारतूस ईदगाह से बरामद क्यों नहीं हुए। ज़ाहिर सी बात है, ये वामपंथियों का चिरपरिचित मुस्लिम विरोधी स्वर था जो कि वी पी सिंह और इंदिरा की साम्प्रदायिक सरकारों को बचाने में लग गया था।

अब दिल पर हाथ रख कर बताओ मेरे भाई क्या किसी भी ईद पर आज तक तुमने इन 300 लोगों के घरवालों के गम का सोचा है? कभी तुमने नये कपड़े पहनते सोचा है? चलो ज़्यादा नहीं ईद की नमाज़ के बाद अपनी दुआ में इन मरने वालों को और उनके घर वालों को याद रखा है? कभी ये जानने की कोशिश की कि उनके घर वाले कैसे गुज़र करते होंगे?”

“मेरे दोस्त बात तो तुमने दिल पर असर करने वाली कही। पर जो आज तक नहीं हुआ ज़रूरी तो नहीं के कभी न हो। मैं मानता हूं हमने मुरादाबाद को याद नहीं किया पर अब तो कर सकते हैं। मैं अपनी ग़लती मानता हूं की शेर कहना या फ़ेसबुक पर लिखने से कुछ हासिल न होगा। पर हम ये तो कर सकते हैं की अब दिल से अपने भाइयों को और बहनों को वो माने जो वो हैं। क्यों न हम सब मिलकर यों कर लें कि ईद पर अपने ख़र्चे कम कर लें और अपने उन भाइयों और बहनों की मदद करें जिन्होंने अपने ख़ास खोये हैं। क्या भाई की मौत के बाद उसकी मां की ज़िम्मेदारी तुम्हारी और मेरी नहीं है?

सच कहूं तो मैं शायद मुरादाबाद की ये ख़ूनी ईद के बारे में जानता तो कभी ईद पर ख़ुशी का इज़हार न कर पाता। क्या ये एक अच्छा मौका न होगा कि हम सब अपने ईद की फिजूलखर्ची को घटा कर उससे उन मुसलमानों को रोज़गार दिलाने में मदद करें जिनके रोज़गार स्लॉटर हाउस के बंद होने से जा रहे हैं? साकिब, मेरे भाई, क्या तुम मुझसे इत्तेफाक़ नहीं रखते?”

“शरजील मुझे ख़ुशी है की तुम इस सोयी हुई कौम से आज भी इतनी उम्मीद रखते हो कि ये एक दुसरे के सुख दुःख में शामिल होंगे। तुमको लगता है कि ये एक दुसरे को भाई समझते हैं जो एक भाई का रोज़गार खो जाने पर उसको नया दिलाने में मदद करेंगे। जो एक भाई के लापता होने पर, एक भाई के मरने पर ऐसे ही महसूस करेंगे जैसे वो उनके परिवार का सदस्य था। लेकिन मेरे भाई मुझे दुःख है कि तुम ग़लत सोचते हो।

ये कौम सोयी हुई है, तुम सो रहे हो, मै सो रहा हूं, हम सब सो रहे हैं। कुछ देर के लिए इनकी बात कर लेंगे फिर सो जायेंगे क्योंकि हम अभी तक बचे हुए हैं। शरजील ऐसा करो तुम सो जाओ, मैं भी सोने जा रहा हूं, सोते हुए ख्वाब दिखते हैं और ख्वाब हसीं होते हैं, जहां ‘अच्छे दिन’ आ चुके होंगे।”

साभार: नेशनल दस्तक

(साकिब सलीम और शरजील ईमाम जेएनयू में इतिहास के शोधकर्ता हैं)

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