Sunday , September 24 2017
Home / Crime / जब मुस्लमान समझकर एक हिन्दू को ही मार डाला था बजरंग दल के लोगों ने

जब मुस्लमान समझकर एक हिन्दू को ही मार डाला था बजरंग दल के लोगों ने

इससे पहले की आप मेरे इस पोस्ट को पढ़े जो करवान के छठे दिन पर लिखा है, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि जो मैंने एक जवान आदमी की फोटो यहाँ पेश कि है उसको ज़रा एक नज़र देखें। उसके हथेलियों को दिल के आकार में कपाट किया जा चुका है। यह तस्वीर उसके दोस्त ने उस दिन खींची थी जिस दिन उसकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन था। उस लड़के के परिवार को यह उस के मोबाइल फोन में उस रात मिली जब उसकी बॉडी आयी।

उनका नाम हरीश पूजारी था। उसकी यह मौत इसलिए डरावनी है क्योंकि उसकी हत्या का कारण यह था कि उसको गलती से मुस्लिम समझ लिया गया था, क्योंकि वह अपने मुस्लिम दोस्त समीउल्लाह के साथ बाइक पर जा रहा था। हरीश के पिता भी ज़्यादा पैसा नहीं कमाते हैं, सिर्फ बेंटवाल गांव में अपने घर पर बैठकर बिड़ी बनाते हैं। इसलिए उनके इकलौते बेटे हरीश को कक्षा 9 में स्कूल से निकाल दिया गया, और प्रशिक्षित और बिजली के मिस्त्री का व्यापार सीखा। उसकी मां उसे एक आज्ञाकारी बेटा मानती है, जो उसको घर चलाने के लिए अपना सारा कमाया हुआ पैसा दे दिया करता था। उसके परिवार की माली हालत उस वक़्त और ख़राब हो गयी जब उसके पिता के कैंसर होने का पता चला।

12 नवंबर, 2015 को हरीश अपने दोस्तों के साथ पिकनिक पर घूमने चला गया। वह उस शाम को घर लौट आया, और कुछ मिनटों के लिए फिर से बाहर दूध खरीदने के लिए निकल गया ताकि चाय के लिए दूध ला सकें जो उसकी मां उबल रहा थी। वह फिर कभी वापस नहीं आया। उसकी मां सीतम्मा पूरी रात उसकी चिंता करती रहीं। उनके पति बिस्तर पर पढ़े थे, और उनकी बेटी मितालाक्ष्मी एक शादी के लिए गांव से बाहर गयी थी। अगले दिन, उसके बेटे को घर लाया गया, जिसको 14 बार चाक़ू से वार किया गया था। वह समझ नहीं पा रही थी की यह सब उसके बेटे के साथ किसने किया था और क्यूँ।

बाद में एक जांच के बाद एक कहानी बनाई गई थी कि जब वह दुकान से लौट रहा था, तो उसके करीबी दोस्त समीउल्लाह, जो एक मुस्लिम है, पास से गुजर रहा था और उसे उसने अपनी बाइक पर घर छोड़ने की पेशकश की। यह बस एक तीन मिनट की सवारी थी. लेकिन रास्ते में, उन्हें कुछ बजरंग दल  के लोगों ने उनको उकसाया और फिर चाकू से उन पर वार कर दिया। समिउल्लाह बुरी तरह घायल हो गया लेकिन फिर भी बच गया था। लेकिन उसके दोस्त को 14 बार चाक़ू से मारा गया और उसकी आंते बाहर निकाल आई थी, और वह मर गया।

जब दो साल बाद करवान सीतमा और उनकी बेटी से मिला, तो हरीश की मां अभी भी अपने ही बेटे के बारे में सोचती रहती थी की ऐसी क्या अशुभ घडी थी की उसका बेटा उसको छोड़ कर चला गया। आखिर उन अजनबियों ने उसे क्यों मारा जो उसे जानते तक नही थे। उसके पिता, जो बेहद सदमे में थे, उनके बेटे के मर जाने के दो महीने बाद ही उनकी भी मृत्यु हो गई।

मिथालक्ष्मी एक ट्रैवल एजेंसी में काम करती है, अपने परिवार को एक साथ रखने के लिए बहादुरी से संघर्ष कर रही है। दिल भारी कर, हम अपने घर से मैंगलूर गए जहां कई लोग एक अमन सभा या शांति बैठक के लिए इकट्ठे हुए, ताकि वहां करवान का स्वागत हो सके। हमने गौरी लंकेस को श्रद्धांजलि अर्पित की, और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ उनकी साहसी लड़ाई। हमने एक साथ नापा कि कैसे तटीय कर्नाटक, जो विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच अपनी सांप्रदायिक मैत्री के लिए लंबे समय से जाना जाता है, अब सांप्रदायिक कड़ाही में विकसित हो चुका था। दोपहर में, आयोजकों ने हमें कृष्णापुरा गांव में एक परिवार के यहाँ ले गये और वहां हमें दिखाया कैसे यह लोग भी नफरत की इस सांप्रदायिक आग से पीड़ित थे। यह सब किसी भीड़ ने नहीं बल्कि वर्दी वाले लोगों ने किया था, बस गौ रक्षा के नाम पर।

यह 19 अप्रैल 2014 को हुआ था, जिसके एक साल बाद कांग्रेस सरकार ने राज्य में सत्ता संभाली थी। एक मजदूरों का परिवार था। मृत व्यक्ति के भाई इम्तियाज ने हमें बताया कि कबीर, उनके 22 वर्षीय सबसे छोटे भाई, एक पेंटर थे। लेकिन उनको पेंट से एलर्जी होने लगी और उन्होंने दूसरे काम की तलाश शुरू कर दी। कर्नाटक में ऐसा कानून है जहाँ बूढ़े मवेशियों की हत्या की अनुमति है और इन जानवरों के परिवहन में अच्छा पैसा था। उन्हें ‘लोडर’ के रूप में इन पशुओं के ट्रक में एक हजार रुपये प्रति दिन का रोजगार मिला था। किसान अपने बूढ़े जानवरों को शिमोगा में एक बड़े मवेशी बाजार में बेच दिया करते, और उनके ट्रक इन जानवरों को तटीय बेल्ट में ले जाया करते। उन्होंने सीखा कि एक स्थापित समृद्ध रैकेट था जिसके द्वारा प्रत्येक चेक-पोस्ट पर पुलिस का भुगतान किया जाना था, और वे ट्रक को मवेशी कार्गो के साथ आगे बढ़ने देंगी।

कबीर के साथ ट्रक माओवादियों नक्सलवादियों से लड़ने के लिए स्थापित विशेष पुलिस बल द्वारा संगिरी में तानिकोट चेकपोस्ट में रुका था। पैसे के भुगतान के बाद भी चेक-पोस्ट पर कोई विवाद शुरू हो गया था। एक कांस्टेबल ने हवा में गोली चलाई, ड्राईवर, क्लीनर और अन्य लोडर सभी वहां से भागने में सफल हो गये। लेकिन उन्होंने कबीर को मार डाला। विश्वासपूर्वक दावा करना असंभव था कि आदमी को मारा गया क्योंकि वह नक्सली थे, गाय की सुरक्षा बल का जनादेश नहीं थी, और चाहे वह भी हो, इस के लिए एक आदमी को क्यों मारना चाहिए? बड़े पैमाने पर नाराजगी थी, और पुलिस ने आखिर में हत्यारे कांस्टेबल के खिलाफ चार्जशीट फाइल कर दी। लेकिन हाल ही में राज्य प्रशासन में भी इस मामले को बंद करने के मामले में मुकदमा पूरा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।

TOPPOPULARRECENT