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जमहूरीयत का क़त्ल हो तो अदालत ख़ामोश नहीं रह सकती: सुप्रीमकोर्ट

नई दिल्ली 05 फ़रवरी:गवर्नर्स के इख़्तयारात का जायज़ा लेते हुए सुप्रीमकोर्ट ने इस बयान का सख़्त नोट लिया कि गवर्नर के सभी फ़ैसले अदलिया के दायरा कार में नहीं आते। अदालत ने कहा कि जब जमहूरी अमल का क़त्ल-ए-आम किया जाता है तो सुप्रीमकोर्ट ख़ामोश तमाशाई नहीं रह सकता।

सुप्रीमकोर्ट की एक पाँच रुकनी दस्तूरी बेंच ने जस्टिस जेएस खीहर की क़ियादत में इस मुक़द्दमा की समाअत करते हुए ये रिमार्क किया। जब अरूणाचल प्रदेश के बीजेपी रुकने असेंबली के वकील ने अदालत से ये कहा कि गवर्नर्स के इख़्तियारात में ये वाज़िह है कि अदालतें गवर्नर के तमाम फ़ैसलों पर नज़र-ए-सानी नहीं कर सकतीं। इस मौके पर अदालत ने रिमार्क किया कि जब जमहूरीयत का क़त्ल हो रहा हो तो अदालत किस तरह ख़ामोश रह सकती है?।

बेंच ने इस दौरान अरूणाचल प्रदेश असेंबली में होने वाली बातचीत की माह अक्टूबर से अब तक की तमाम तफ़सीलात और डिस्पैच रिकार्ड 8 फ़रव‌री को अदालत में पेश करने की हिदायत दी है और कहा कि जो दस्तावेज़ात असेंबली के एक ओहदेदार ने पेश किए हैं वो काबिले इतमीनान नहीं हैं।

बेंच में जस्टिस दीपक मिश्रा जस्टिस एमबी लोकर जस्टिस पीसी घोष और जस्टिस एन वी रमना शामिल हैं। बेंच ने रियासती असेंबली के स्पीकर नाबम रेबिया और गवर्नर जेपी राज खोह के बीच असेंबली मीटिंग की क़बल अज़ वक़्त तलबी और बाग़ी कांग्रेस अरकाने असेंबली को ना-अहल क़रार देने जैसे मसाइल पर हुई बातचीत की तफ़सील तलब की है।

कुछ बाग़ी कांग्रेस अरकाने असेंबली की पैरवी करते हुए सीनीयर वकील राकेश दिवेदी ने गवर्नर के फ़ैसलों की ताईद की और कहा कि असेंबली मीटिंग की तलबी को ग़ैर जमहूरी नहीं कहा जा सकता और ना ही जमहूरी अमल को इस से मुतास्सिर क़रार दिया जा सकता है।

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