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जम्मू-ओ-कश्मीर सालसों की ख़ुसूसी क़ानून पर नज़रे सानी (दोबारा गौर करने)की सिफ़ारिश

जम्मू-ओ-कश्मीर के बारे में सालसों की रिपोर्ट में मुतनाज़ा ( जिस बात के लिए वाद विवाद हो) मुसल्लह अफ़्वाज ( सशस्त्र सेनाएं) ख़ुसूसी इख़्तेयारात क़ानून पर रियासत में नज़रे सानी (दोबारा गौर करने) की सिफ़ारिश की गई है और कहा गया है कि वज़ा

जम्मू-ओ-कश्मीर के बारे में सालसों की रिपोर्ट में मुतनाज़ा ( जिस बात के लिए वाद विवाद हो) मुसल्लह अफ़्वाज ( सशस्त्र सेनाएं) ख़ुसूसी इख़्तेयारात क़ानून पर रियासत में नज़रे सानी (दोबारा गौर करने) की सिफ़ारिश की गई है और कहा गया है कि वज़ारत-ए-दिफ़ा (रक्षा मंत्री)को इस मसला पर मुसबत रद्द-ए-अमल ( प्रतिक्रिया) ज़ाहिर करने के तरीक़ा पर ग़ौर करना चाहीए।

176 सफ़हात की रिपोर्ट जो जम्मू-ओ-कश्मीर के सालसों दिलीप पडगावनकर, राधा कुमार और एम एम अंसारी ने पेश की थी, आज बरसर-ए‍आम ( सबके सामने) पेश कर दी गई। इस रिपोर्ट में जम्मू-ओ-कश्मीर के रिहायशी इलाक़ों में तैनात फ़ौज की तादाद में की और उन के ज़ेर-ए-क़ब्ज़ा जायदादों से तख्लिया ( खाली कराना) की सिफ़ारिश भी शामिल है ताकि मुक़ामी ( स्थानीय) शहरी समाजी मआशी ( जीविका संबंधी) सरगर्मीयां जारी रख सकें।

रिपोर्ट में अवामी सलामती क़ानून में तरमीम की भी सिफ़ारिश की गई है, जो फ़ौज को वसीअ तरीन ( सबसे ज्यादा) इख़्तयारात देता है कि वो नफ़रत और दुश्मनी के एहसासात-ओ-जज़बात पैदा करने की कोशिश करने या तैयारीयां करने की बुनियाद पर अवाम को हिरासत में ले सके, जिस से रियासत की फ़िर्कावाराना हम आहंगी ( संप्रादायिक दंगो) के लिए ख़तरा पैदा हो सकता हो।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सयान्ती इंतेज़ामात ख़ास तौर पर गड़बड़ ज़दा इलाक़ा क़ानून पर नज़रसानी ( नज़र रखना) ज़रूरी है और फ़ौज के ख़ुसूसी इख़्तेयारात क़ानून के बारे में फ़ैसला किया जाना चाहीए। क़ानून अवामी सलामती में तरमीम (तब्दीली) की जानी चाहीए। रिपोर्ट में कहा गया है कि इंसानी हुक़ूक़ ( मानवीय अधीकार) की सूरत-ए-हाल और क़ानून की हुक्मरानी में बेहतरी पैदा हुई है।

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