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जम्मू से राजधानी दिल्ली पहुंचे रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी

वह दो साल पहले जम्मू में एक झोंपड़ी में पैदा हुआ था। पिछले कुछ महीनों में जम्मू में उत्पीड़न के बाद 30 लोगों के समूह के साथ एक बार फिर निर्वासित होकर मोहम्मद रिहान अपने माता-पिता के साथ राजधानी दिल्ली पहुंचा है। उसकी मां रेशमा तारा (18) और उनके पिता इमाम हुसैन (20) विकासपुरी में संयुक्त राष्ट्र उच्चायोग के शरणार्थियों (यूएनएचसीआर) के कार्यालय के द्वार से बाहर बैठे हैं।

 

 

 

हम अपने बच्चों के लिए कुछ खाना चाहते हैं और वह जगह जहां हम शांति से रह सकते हैं। बीमार लोगों के लिए कुछ दवाएं भी हमें चाहिए। पिछले कुछ महीनों में जम्मू में चीजें बहुत खराब हुई हैं। हम वहां दो साल से ज्यादा समय तक रहे हैं लेकिन अब वापस जाना बहुत जोखिम भरा है।

 

 

 

 

हुसैन कहते हैं कि उसका डर निराधार नहीं है। भारत में अनुमानित 10,000 रोहिंग्या मुस्लिम हैं जिनमें 5,700 जम्मू और उसके आसपास रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके निर्वासन की मांग अधिक मुखर हो गई है। हालांकि कुछ आलोचकों ने आरोप लगाया है कि रोहिंग्या का आव्रजन राज्य की जनसांख्यिकी को बदलने का एक प्रयास है जबकि भाजपा ने उच्च न्यायालय से शरणार्थियों की पहचान और निर्वासन की मांग की है।

 

 

 

 

पिछले महीने जम्मू में कईरोहिंग्या मुस्लिम के घरों को रहस्यमय आग लग गई थी जिसके बाद वो बेघर हो गए थे। शाहीन आलम कहते हैं कि उन्हें दस्त लग गए हैं तथा दिल्ली में एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। हमारे पास बहुत कम खाना है और पैसे भी नहीं हैं। दूसरों लोग भी बीमार पड़ गए हैं।

 

 

 

 

एक अन्य शरणार्थी हसीना बेगम को यूएनएचसीआर द्वारा बुलाया जाता है। वहां वह अपनी दुःख भरी दास्तान रखती है। उन्होंने मुझसे इंतजार करने के लिए कहा। यूएनएचसीआर पंजीकृत शरणार्थियों को पहचान पत्र जारी करता है। यूएनएचसीआर सरकार, गैर-सरकारी संगठन और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर शरणार्थियों के लिए काम करता है।

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