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जहेज़ के भिकारी

आज मुस्लिम मुआशरा (नागरीक्ता) में जहेज़ के नाम पर लूट खसूट पूरी शिद्दत से जारी है। जहेज़ की लानत और रस्म-ओ-रिवाज की बिद्दतों से मुतास्सिर मुस्लिम मुआशरा की इस्लाह की कोई सूरत नज़र नहीं आती। चाहे अमीर हो या ग़रीब, आलिम हो या जाहिल, सभी का

आज मुस्लिम मुआशरा (नागरीक्ता) में जहेज़ के नाम पर लूट खसूट पूरी शिद्दत से जारी है। जहेज़ की लानत और रस्म-ओ-रिवाज की बिद्दतों से मुतास्सिर मुस्लिम मुआशरा की इस्लाह की कोई सूरत नज़र नहीं आती। चाहे अमीर हो या ग़रीब, आलिम हो या जाहिल, सभी का दामन इस बिद्दत से दागदार है, हर किसी ने जहेज़ को लाज़िमी और दीगर रुसूमात बद को इबादतों का दर्जा दे रखा है। अख्लाक़ी हालत इस हद तक बिगड़ चुकी है कि हराम-ओ-हलाल की तमीज़ तक बाक़ी नहीं रही, दौलत की हिर्स-ओ-लालच ने मुसल्मानों को अंधा कर रखा है, जिन्हों ने अपनी मेहनत-ओ-क़ाबिलीयत के बलबूते पर दौलत हासिल करने की बजाय शादी जैसे फ़ित्री तक़ाज़ा को हुसूल दौलत का ज़रीया बना लिया है।

कहा जाता है कि जब इंसान में हया ख़त्म‌ हो जाती है तो वो बेग़ैरत बन जाता है। ये बात आज मुसल्मानों पर सादिक़ आती है, क्योंकि मुस्लिम मुआशरे में जहेज़ की लानत का आम होना ख़ुद इस बात का सबूत है कि आज मुसल्मान बेग़ैरती की हदों को पार करचुके हैं। आज हर कोई जहेज़ का भिकारी बना हुआ है और इस भीक को हासिल करने के लिए बेशुमार घरों पर दस्तक देता नज़र आता है।

अफ़सोस कि एक आम भिकारी में इतनी तो ग़ैरत होती है कि वो एसी जगह भीक नहीं मांगता, जहां उसे भीक मिल्ने की उम्मीद ना हो, लेकिन जहेज़ के ये भिकारी एक मज्बूर और परेशान हाल मुसल्मान से भी जहेज़ की भीक मांगने से बाज़ नहीं आते।

जहेज़ के लिए वो कभी दस्तूर ज़माना की दहाई देते हैं तो कभी दरोग़ गोई के ज़रीया लड्की वालों को रुझाने की कोशिश करते हैं, या फिर अपने जहेज़ के मुतालिबात को वाजिबी साबित करने के लिए ये दलील देते हैं कि जब हम ने अपनी लड्की की शादी में जहेज़ और नक़द रक़म दी है तो अपने लड्के के लिए जहेज़ का मुतालिबा करने में क्या हर्ज है। ये तो वही बात हुई कि अगर किसी के घर डाका ज़नी हो तो वो भी दूसरे के घर डाका डाल सकता है। यही वो शैतानी सोँच हे, जो आज जहेज़ के लाल्ची और दौलत के हरीस मुसल्मानों को लुटेरों में तब्दील कर दिया है।

मुस्लिम मुआशरे में एक तब्क़ा ऐसा भी है, जो बज़ाहिर अवाम में दीनदार और तक़वा पसंद कहलाता है, लेकिन इस के दिल में भी अपने लड्कों के लिए माल और जहेज़ की ख़ाहिश चुटकियां लेती रहती है। चूँ कि वो खुले आम अप्नी ख़ाहिश का इज्हार नहीं कर सकते, इस लिए वो साँप भी मर जाय और लाठी भी ना टूटे के मक़ूला पर अमल करते हुए एसा दौलतमंद घराना तलाश करते हैं, जहां से बिन मांगे ही दिल की मुरादें पूरी हो जाएं।

आज निकाह के लिए लड़की वालों से नक़द रक़म, सोना, गाड़ी और मुख़्तलिफ़ क़ीमती अशीया जहेज़ के नाम पर तलब करना लड़के वालों ने अपना हक़ समझ रखा है। उन्हें इत्ना भी एहसास नहीं कि एक लड्की को बचपन से जवानी और फिर घर ग्रहस्ती के काबिल बनाने तक लड्की के वालदैन को कित्नी मशक़्क़तें उठानी पड़ी होंगी।

क्या ये लड्की के वालदैन की बेलौस मुहब्बत नहीं, जिन्हों ने अपनी बेटी की बड़े ही लाड प्यार से परवरिश की?। क्या ये लड़की के वालदैन का ईसार नहीं, जिन्हों ने कसीर रक़म सर्फ़ करके अपनी बेटी को तालीम-ओ-तर्बीयत से आरास्ता किया?। क्या ये लड़की के वालदैन की बेमिसाल क़ुर्बानी नहीं, जो अपनी लख़त-ए-जिगर को बगै़र किसी ज़ाती मुफ़ाद के सिर्फ अल्लाह के हुक्म पर एक
अजनबी मर्द के हवाले कर देते हैं?।

लड़की के वालदैन की इस ना क़ाबिल फ़रामोश ईसार-ओ-क़ुर्बानी के लिए लड़के वालों को एहसानमंद और शुक्र गुज़ार होना चाहीए। इस एहसान का बद्ला सिवाए जवाबी एहसान के और कुछ हो ही नहीं सकता, लिहाज़ा उस की सूरत गिरी इस तरह हो सकती है कि कम अज़ कम शादी के दो तरफ़ा अख़राजात लड्का ख़ुद बर्दाश्त करे।

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