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ज़रई यूनीवर्सिटी राजेंद्र नगर में एक और गैर आबाद मस्जिद की मौजूदगी का इन्किशाफ़

अबू ऐमल -  शहर और मज़ाफ़ाती (दूर-दराज के) इलाक़ों में ऐसा लगता है कि कई क़दीम (बहुत पूराने) क़ुतुब शाही मसाजिद को मुस्लमानों की नज़रों से छुपाया जा रहा है क्योंकि किसी ग़ैरत मंद मुस्लमान की नज़र उन मसाजिद पर पड़ जाए तो वो उसे आबाद कर

अबू ऐमल –  शहर और मज़ाफ़ाती (दूर-दराज के) इलाक़ों में ऐसा लगता है कि कई क़दीम (बहुत पूराने) क़ुतुब शाही मसाजिद को मुस्लमानों की नज़रों से छुपाया जा रहा है क्योंकि किसी ग़ैरत मंद मुस्लमान की नज़र उन मसाजिद पर पड़ जाए तो वो उसे आबाद करने के लिए उठ खड़ा होगा। आप को याद होगा कि सियासत ने एक हफ़्ता क़ब्ल ज़रई यूनीवर्सिटी राजेंद्र नगर में मौजूद दो गैर आबाद मसाजिद के बारे में एक तफ़सीली रिपोर्ट शाय की थी।

इस सिलसिला में मज़ीद (और) तहक़ीक़ात पर इस बात का इन्किशाफ़(खुलासा) हुआ कि वहां दो नहीं बल्कि तीन मसाजिदहैं। तीसरी मस्जिद को जान बूझ कर मुस्लमानों की नज़रों से ओझल कर दिया गया। इस तीसरी मस्जिद तक हमें पहुंचाने में यूनीवर्सिटी के मुस्लिम स्टाफ़ के साथ साथ ग़ैर मुस्लिम भाईयों का अहम रोल रहा क्योंकि राक़िम उल-हरूफ़ ने कई मर्तबा दोनों मसाजिद का दौरा किया था लेकिन तीसरी इंतिहाई क़दीम (बहुत पूराने) मस्जिद तक रसाई मुम्किन ना हो सकी थी क्योंकि मुतअस्सिब ज़हनों ने उसे बड़े बड़े दरख़्तों के ज़रीया छिपा दिया है। ये मस्जिद हरीथा हॉस्टल के अंदरूनी हिस्सा में है।

जब हम मसाजिद के मुक़ाम पर पहूंचे तो ये देख कर हैरत हुई कि मस्जिद के बिलकुल सामने किसी बुज़ुर्ग की दरगाह भी है जो चोखनडी से घिरी हुई है। इस मज़ार पर एक कुतबा है, जिस पर तफ़सीलात दर्ज हैं। अक्सर हम ने मसाजिद को गैर आबाद देखा है पहली मर्तबा एक दरगाह को छुपा देने का वाक़िया हमारे सामने आया। सब से अफ़सोसनाक बात तो ये है कि बड़ी झाड़ीयों को पार करते हुए जब इस मस्जिद में पहूंचे तो देखा कि मिंबर के पास एक बड़ा सा गढ़ा खोद दिया गया है जो 4 फुट गहिरा होगा। ज़राए से पता चला कि खज़ाने की तलाश में चंद बदबख़्तों ने ये हरकत की है। हद तो ये है कि अल्लाह के घर के दुश्मनों ने खोदे हुए गढ़े को उसी तरह छोड़ दिया है।

हमें अफ़सोस तो इस बात पर हुआ कि 5500 एकड़ अराज़ी को मुकम्मल तौर पर बाउंड्री से घेर दिया गया और इस में जो प्रीथा हॉस्टल है इस की अलग बाउंड्री है और सीकोरीटी भी तैनात रहती है। इस के बावजूद मसाजिद तक पहूंचना और वहां खुदाई करना आसान काम नहीं। इस से दाल में कुछ काला नज़र आता है। साथ मस्जिद को छुपा देना उस की बेहुर्मती करना ये बात भी अजीब लगती है। तीसरी मस्जिद का पता लगने के बाद ऐसा लगता है कि 5500 एकड़ अराज़ी पर फैली यूनीवर्सिटी में कुछ और मसाजिद भी होंगी। ।

सदर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड मौलाना राबे हसनी नदवी और जनाब कमाल फ़ारूक़ी ने गैर आबाद मसाजिद को मंज़र-ए-आम पर लाने और उन्हें आबाद करने के साथ साथ मौक़ूफ़ा जायदादों के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सियासत की कोशिशों की ज़बरदस्त सताइश भी की थी। इस वाक़िया को ब्यान करने का मक़सद ये है कि सारी दुनिया में हैदराबाद की मुस्लिम तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को क़दर की निगाह से देखा जाता है और उसे हिंदूस्तान में मुस्लिम अक्सरीयती इलाक़ों का दिल भी कहा जाता है, लेकिन अफ़सोस के मुस्लमानों के इस तारीख़ी शहर में मसाजिद गैर आबाद हैं।

औक़ाफ़ी जायदादों पर लैंड गिराबर्स क़ाबिज़ हैं जबकि हुकूमतों ने भी औक़ाफ़ी जायदादों की तबाही में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहरहाल अब रमज़ान उल-मुबारक की आमद -आमद है। इस माह-ए-मुबारक के इस्तिक़बाल की तैय्यारीयां ज़ोरों पर है। मसाजिद की आहक पाशी और साफ़ सफ़ाई का काम मुकम्मल हो चुका है। इफ़तार-ओ-तरावीह और तहज्जुद के इंतिज़ामात को क़तईयत दी जा रही है। ऐसे में हम ने गैर आबाद मसाजिद के बारे में सोचना तक गवारा नहीं किया। इसी तरह औक़ाफ़ी जायदादों पर नाजायज़ क़ब्ज़ों और उन की तबाही का भी हमें ख़्याल तक नहीं आया।

आज हम ये सवाल करते हैं कि औक़ाफ़ी जायदादों को तबाही से बचाना, गैर आबाद मसाजिद को आबाद करना, छुपाई गई मसाजिद को मंज़र-ए-आम पर लाना, ख़ाती अनासिर(दोषी लोग) के चेहरे बेनकाब करना आख़िर किस की ज़िम्मेदारी है ? इस का जवाब हम क़ाइरीन पर छोड़ते हैं। abuaimalazad@gmail.com

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