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जाति अब तक कैसे ?

अभय

नई दिल्ली 

क्यों कहाँ जाता है कि जाति कभी नही जाती , क्या बात सच्च है तो आज तो ये भी तो पता चले जाति कहाँ से है आती ,घर में आप ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जा सकते है लेकिन जाति में ऐसा नही हो सकता जिसमे आप पैदा हो गये वही आपको मरना पड़ेगा( अंबेडकर ) , क्या शुरू से ऐसा है ? इसका भी जवाब मिलेगा आपको .. , राम ने सबरी के बेर खाये क्यों इतना गया जाता है इस बात को जबकि भगवन के लिए तो सब एक है न , फिर भी ऐसा क्यों ?

आज भी मंदिर paytm ले रहे है लेकिन कुछ जातियों को मंदिर में नही ले रहे , आप मॉडर्न जरूर  हो रहे है लेकिन पुरानी चीज़ों के साथ ,देखो न हम बहुत मॉडर्न हो गए है पहले जो जाति प्रणाम पत्र जो हस्तलिखित होता था आज वो कंप्यूटर वाला हो गया है , लेकिन जाति आज भी है , आज जाति का नाम ऐसे लिया जाता है जैसे नाम वही हो बाकि तो बेमतलब का है आपने सुना होगा पांडेय जी , यादव जी , सबसे गन्दा जो बोला जाता है चमार ये सब नाम लिया जाता है समाज में ,यही हुए है आप मॉडर्न ।

क्या सरकारे भी जाति को बढ़ावा देती है ? क्या जाति का राजनीतिकरण कर दिया सरकारों ने ? जाति व्यस्था के बारे में … सिद्धान्त रूप में चार वर्ण , गुण -कर्म के अनुसार है । लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नही , स्तिथि बहुत जटिल है । जाति जन्मगत होती है और विवाह- संबध जाति के अंदर ही होते है ।

जातियों और वर्ण में सबसे बड़ा फर्क ये है वर्ण सिर्फ चार है लेकिन जातिया हज़ारो की संख्या में है । आज अलग-अलग जातियों की अलग-अलग पंचायत तक है । जाति केवल हिन्दू धर्म में नही आज आज हम इसे सिख , मुस्लिम , ईसाई सबमे जाति-व्यवस्था पाई जाती है जाति कहाँ से है आती ? आज साइंस का जवाना है , और साइंस उसी बात को मानती है जिसका प्रूफ हो , लेकिन सामाज में आज भी जाति बिना प्रूफ के चल रही है , किसने जाति बनाई ? क्यों बनाई ? कहाँ लिखा है जाति के बारे में ? किसने लिखा है जाति के बारे में ?

इन सभी सवाल को जब पूछा जाता है तो जवाब मिलता ह बाप-बूढ़े मानते है हम भी मानते है ,हमे भगवन ने बनाया है यही जवाब मिलते है लेकिन किसी के पास कोई ठोस जवाब नही है जो साइंस की मांग होती है जो इन सब को मानता है उनके लिए बुद्ध ने कूछ कहाँ है – मुर्ख लोगो की पहचान करने के कुछ बाते है , ये वो लोग है जो अपनी बुद्धिमान्ता को खो चुके है जो लोग वेदों की वैधता को मानते है , जो किसी रचनाकार को मानते है जिसने हमे बनाया , जो अपनी जाति पर घमंड करते है और जो अहिंसा में लिप्त होते है जाति क्या पहेले सिर्फ चार वर्ण में थी या कहे तब जाति नही सिर्फ वर्ण हुआ करते थे , ये चारों वर्ण जो काम किया करते थे उसी के अधार पर होते थे , कोई न जन्म से ब्राह्मण था न कोई सूद्र इसको साबित करने के लिए कुछ बाते जब महाभारत में एक जगह युधिष्टिर से पूछा जाता है कि ब्राह्मण कौन है तो वो इसका जवाब देते है जो सच्चा हो ,

बुद्धिमान हो , दयालु हो ये सब जिसमे गुण होंगे वो ब्रामण होगा चाहे वो लाही पैदा हुआ हो (अजगरपर्वन में यनपर्वन) मनु खुद लिखते है कि “हर आदमी शुद्र पैदा होता है बाद में वैदिक संस्कार के बाद कुछ बनता है ” जाति जन्म के आधार पर थी ही नही , नही तो खुद सोचिये की जानवर में फर्क किया जा सकता है क्या किसी ऊँची जाति और नीची जाति में फर्क कर के बता सकते है (बुद्ध) ब्राह्मण कोई जाति नही है वो एक उपाधि है ,क्योंकि जाति में भेद नही किया जा सकता और ये जो उपाधि है वो समाज देता है न की जन्म लेने के कारण है (G.C pandey reading) अगर जाति जन्म के आधार पर होती तो इसका मतलब किसी का शरीर ही वो जाति क्योंकि वो वहाँ पैदा हुआ , अगर ऐसा है तो किसी ब्राह्मण के मारे हुए शारीर को जलाना ब्रह्मा हत्या कहलाता लेकिन ऐसा नही है तो इसे भी साबित होता है कोई जन्म से कुछ नही होता (G.C pandey reading) जो काम हुआ करता था उसके हिसाब से वर्ण थे जैसे ज्ञान जिसका काम है या जिसके पर ज्ञान है वो ब्राह्मण है चाहे वो कही पैदा हुआ हो , क्योंकि ब्राम्हण कोई जाति नही उपाधि थी इन सब बातों के बाद भी आज भी जाति जिन्दा ही नही बल्कि पूरी तरह से लागू भी है ,

ऐसा कैसे हुआ जब कही लिखा नही था तो जन्म के आधार पर जाति कैसे आई ? इसका जवाब ये है जब एक वर्ग ऐसा पैदा हो गया जिसने एक जगह कब्ज़ा कर लिया और अपने आप को खुद से मान्यता दे दी , ये वर्ग पढ़ा लिखा था इसने अपने आप को सबसे ऊपर घोषित कर दिया , और वेदों की व्यख्या अपने हिसाब से करने लगा , इस वर्ग ने एक नई कल्पना करी की जिससे ये उच्च पद हरदम इसी के पास रहे , इसने जन्म के आधार पर जाति को जोड़ दिया (G.C pandey reading) इसी बात को समझने के लिए विकेकानंद की एक बात – एक स्थान पर वे कहते हैं- ‘स्मृति और पुराण सीमित बुद्धिवाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेदभाव और द्वेषभाव से परिपूर्ण हैं. …राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे. …पुरोहितों की लिखी हुई पुस्तकों में ही जाति जैसे पागल विचार पाए जाते हैं.’ इतनी आलोचना के बाद भी आज भी जाति बची हुए है क्योंकि अब जाति का राजनीतिकरण हो चूका है ।

जाति अब एक राजनितिक रूप ले चुकी है , इसी के रूप में रजनी कोठारी ने की बात – जाति का राजनितिकरण । हम आजाद हुए , वक़्त के साथ सब पुरानी बातें जाती गई , हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे थे लेकिन एक चीज़ जो जब भी थी और अब भी है वो है जाति अब ये राजनीति में घुस चुकी है , जाति को राजनीति से फायदा भी हुआ लेकिन राजनीती ने ज्यादा फ़ायदा उठाया जाति से , राजनीती को संख्या बल चाहिए होता है जो उससे जाति से मिला , जाति आज संगठित हो गई है जैसे मौर्य समाज , यादव समाज , आदि , पहेले जाति को हटाने की बाते की जाति थी अब केवल जाति में सुधार की बाते की जाती है , जाति को हटाने की बात अम्बेडकर और गाँधी की एक बात – गांधीजी अंबेडकर के इस विचार से सहमत थे,”अछूत जाति-प्रथा कायम रहेगी,अछूत बने रहेंगे।

जाति-प्रथा को समाप्त किये बिना अछूतोद्धार असंभव है।” अंबेडकर ने तर्क दिया,”टूटे-फूटे मकान की रंगाई-पुताई करके उसके दुर्दशा को छिपा तो सकते हैं,सुधार नहीं सकते। ऐसी हालत में उसे गिराकर नया मकान बनाना ही उपयुक्त होगा।” इनके अनुसार अस्पृश्यता की जड़े हिन्दू वर्ण व्यवस्था में निहित है,अतः इस कुप्रथा को मिटाने के लिए वर्ण-व्यवस्था का अंत जरूरी है। लेकिन आज की राजनितिक पार्टी खत्म करने की बात नही करती जाती को बल्कि इसको बनाये रखने में मद्दत करती है इसका बात को आप देख सकते है देश को जो आज प्रधानमंत्री है वो 2014 के इलेक्शन टाइम पर अपने आप को जोर जोर से OBC बता रहे थे , अब जाति को बनाये रखने के लिए राजनीति कुछ लालच देती है जैसे आरक्षण ,

कुछ और फायदे , इससे वो आज तक जाति को बनाये रखने में कामियाब है , अब यूपी चुनाव में आप इसे खूब देखेगे जाति कैसे एक राजनितिक औजार बन कर सामने आता है इस बातो को साबित करने के लिए कुछ विचार- प्रोफेसर रुडोल्फ के अनुसार ”भारत राजनीतिक लोकतन्त्र के संदर्भ में जाति वह धुरी है जिसके माध्यम से नवीन मूल्यों और तरीकों की खोज की जा रही है । यथार्थ में यह एक ऐसा माध्यम बन गयी है कि इसके जरिए भारतीय को लोकतान्त्रिक राजनीति की प्रक्रिया से जोडा जा सकता है ।” प्रोफेसर रजनी कोठारी अपनी पुस्तक “कास्ट इन इण्डियन पॉलिटिक्स” में भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका विस्तृत विश्लेषण किया है। उनका मत है कि अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या भारत में जाति प्रथा खत्म हो रही है ? इसका जवाब ये है उनका -इस प्रश्न के पीछे यह धारणा है कि मानो जाति और राजनीति परस्पर विरोधी संस्थाएं हैं । ज्यादा सही सवाल यह होगा कि जाति-प्रथा पर राजनीति का क्या प्रभाव पड रहा है और जाति-पांति वाले समाज ममें राजनीति क्या रूप ले रही है ? जो लोग राजनीति में जातिवाद की शिकायत करते हैं, वे न तो राजनीति के प्रकृत स्वरूप को ठीक समझ पाए हैं न जाति के स्वरूप को । जयप्रकाश नारायण ने एक बार कहा था कि ”जाति भारत में एक महत्वपूर्ण दल है ।

हरेल्ड गोल्ड के अनुसार ”राजनीति का आधार होने की बजाय जाति उसको प्रभावित करने वाला एक तत्व है ।” जातीय व्यवस्था भारतीय समाज का एक परम्परागत तत्व है । प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास का मत है कि ”परम्परावादी जाति व्यवस्था ने प्रगतिशील और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को इस तरह प्रभावित किया है कि ये राजनीतिक संस्थाये अपने मूलरूप में कार्य करने में समर्थ नहीं रहीं है ।” डी.आर. गाडगिल के शब्दो में ”क्षेत्रीय दबावों से कहीं ज्यादा खतरनाक बात यह है कि वर्तमान काल मे जाति व्यक्तियो को एकता के सूत्र में बांधने में बाधक सिद्ध हुई है ।” इन सब बातों को मिला कर बोला जा सकता है जाति क्यों नही जाती , कभी उसको वेदों के नाम पर बचाया गया , कभी राजनीति ने बचाया , जाति कभी नही जाती ये बोलना गलत है , ये बोलना सही रहेगा की जाति को जाने नही दिया जाता , हम भी अंग्रेजो से कम नही या शायद अंग्रेजो ने हमसे ही सीखा था फुट डालो और राजनीति करो ,क्योंकि जिस दिन ये जाति खत्म हो जायेगी उस दिन आधो की राजनीति खत्म हो जायेगी

लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया मे पत्रकारिता के छात्र हैं

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