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जानें भारत के किस राज्य के मदरसे में पढ़ते हैं 5% छात्र हिंदू

कोलकाता : भारत में बहुत लोगों को यह सुन कर आश्चर्य होगा कि बंगाल के मदरसों में हजारों ऐसे छात्र शिक्षा हासिल करते हैं, जो मुसलमान नहीं, बल्कि हिंदू हैं. पश्चिम बंगाल मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष आबिद हुसैन बताते हैं कि बोर्ड से 512 हाई मदरसा व जूनियर मदरसे जुड़े हुए हैं, जिनमें सात से आठ लाख छात्र पढ़ते हैं. इनमें से पांच प्रतिशत छात्र हिंदू हैं.

2017 में पश्चिम बंगाल मदरसा बोर्ड की में परीक्षा राज्य के हाई मदरसा के 52115 छात्र शामिल हुए, जिनमें 2287 छात्र हिंदू थे, जो कुल परीक्षार्थियों का 4.38 प्रतिशत हैं. 2013 से लेकर 2017 तक आैसतन 4.8 प्रतिशत हिंदू छात्र मदरसा बोर्ड की परीक्षा में शामिल हुए.

हिंदू छात्र केवल परीक्षा में शामिल ही नहीं होते हैं, बल्कि पिछले कई वर्षों में कई हिंदू छात्रों ने मेरिट लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा कर सभी को आश्चर्यचकित कर डाला है. इस वर्ष हावड़ा के खलतपुर हाई मदरसा की छात्रा प्रशमा सासमल ने मेरिट लिस्ट में आठवां स्थान हासिल किया. वर्ष 2014 में बांकुड़ा जिले के बोधारा सिद्दिकिया मदरसा की छात्रा मउ हल्दार ने छठा स्थान प्राप्त किया था, जबकि 2013 में दक्षिण दिनाजपुर के बेलपुकुर हाई मदरसा के छात्र संजय भुइयां ने हजारों छात्रों के बीच दसवां स्थान हासिल कर सभी अचंभे में डाल दिया था.

मुसलमानों की तुलना में अधिक हिंदू छात्र वाले मदरसे
राज्य भर में फैले 512 हाई मदरसों में कम से कम सात ऐसे मदरसे हैं, जहां मुसलमानों की तुलना में हिंदू छात्र अधिक हैं. हुरा थाना मुजफ्फर अहमद अकामदी हाई मदरसे में 1020 छात्र हिंदू हैं, जबकि 700 मुसलमान हैं. आेरग्राम चतुसपल्ली हाई मदरसे में 962 छात्र हिंदू एवं 319 मुसलिम हैं. अलीपुरद्वार जिले में बदाइताइ वजिरिया हाई मदरसा फोर गर्ल्स, वीरभूम जिलों में लाभपुर जूनियर हाई मदरसा, हुगली जिले में हरित अय्यूब हाई मदरसा व दरबा हाई मदरसा एवं पश्चिम मेदिनीपुर जिले में चंद्रकोना इसलामिया हाई मदरसा ऐसे संस्थान हैं, जहां मुसलमान छात्रों की तुलना में अधिक हिंदू छात्र पढ़ते हैं.

स्कूलों की तरह हाई मदरसे में भी सात विषय बंगाली/उर्दू, अंग्रेजी, गणित, शारीरिक विज्ञान, जीव विज्ञान, इतिहास आैर भूगोल पढ़ाया जाता है. इसके साथ ही छात्र इसलाम परिचय व अरबी भी सीख सकते हैं. बोर्ड अध्यक्ष ने बताया कि एक छात्र वैकल्पिक विषय के रूप में इसलाम परिचय या अरबी में से किसी एक को चुन सकता है. अधिकतर छात्र इसलाम शिक्षा को नियमित विषय के रूप में चुनते हैं, क्योंकि अरबी के मुकाबले इसमें अधिक नंबर मिलने की संभावना रहती है.

पश्चिम बंगाल मदरसा बोर्ड का गठन 1927 में हुआ था, पर इसे कानूनी रूप 1994 में उस वक्त मिली, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में अधिनियम पास कर इसे अपने से जुड़े शिक्षण संस्थानों के लिए परीक्षा आयोजित करने का अधिकार दिया गया. बोर्ड के साथ 102 सीनियर मदरसा भी जुड़े हुए हैं, जो केवल धार्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं आैर आलिम (कक्षा दस) एवं फाजिल (कक्षा 12) के समकक्ष परीक्षा आयोजित करते हैं.

मदरसों में पढ़ रहे हिंदू छात्रों के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इनमें से अधिकतर का संबंध अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग से है. 2017 की बोर्ड परीक्षा में जिन 2287 हिंदू छात्रों ने भाग लिया था, उनमें से 930 अनुसूचित जाति एवं 311 अनुसूचित जनजाति के हैं. अर्थात, 54.5 प्रतिशत हिंदू छात्र पिछड़े वर्ग से आते हैं. इसी तरह 2016 में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग के हिंदू छात्रों का प्रतिशत लगभग 71.01 प्रतिशत था. 2015 में यह आंकड़ा 68.2 प्रतिशत एवं 2014 में 71.6 प्रतिशत था.

कमजोर समुदायों के छात्रों को आकर्षित कर रहे मदरसे
शोध संयोजक व नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन द्वारा स्थापित प्रतिचि इंस्टीटयूट के साबिर अहमद ने कहा कि इन मदरसों में पढ़ रहे अधिकतर हिंदू छात्र पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं. हालांकि, शिक्षा के अधिकार कानून के तहत हर इलाके में स्कूल स्थापित करने का प्रावधान है, पर आर्थिक रूप से कमजोर, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति समुदायों के इलाकों में स्थिति बेहद निराशाजनक है. इस स्थिति में मदरसे कमजोर समुदायों के छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं.

आमतौर पर यह माना जाता है कि अभी भी हमारे देश में लड़कों के मुकाबले लड़कियां शिक्षा के क्षेत्र में थोड़ी पीछे हैं, पर पश्चिम बंगाल के मदरसे इसका अपवाद हैं. यहां लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या काफी अधिक है. उदाहरण के तौर पर 2017 में हाई मदरसा के बोर्ड परीक्षा में कुल 52115 छात्रों ने भाग लिया था, जिनमें 36276 लड़कियां थीं, जो कुल छात्रों का 70 प्रतिशत है. मदरसा बोर्ड के सचिव रेजानुल करीम तपादार इसके लिए सामाजिक व आर्थिक कारणों को जिम्मेदार मानते हैं. उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में माता-पिता स्कूलों के मुकाबले मदरसों को अधिक पसंद करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मदरसों में पर्दा प्रथा है आैर वहां लड़कियों लड़कों के साथ नहीं मिलती हैं.

आेरग्राम चतुसपल्ली हाई मदरसा के सेवानिवृत्त हेडमास्टर अनवर हुसैन ने बताया कि पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय के युवा लड़के बड़ी संख्या में रोजगार के लिए छोटी उम्र से ही काम में लग जाते हैं. राज्य के कुछ जिलों में 15-50 वर्ष की उम्र के पुरुष बड़ी मुश्किल से दिखायी देते हैं. 14 वर्ष की उम्र होते ही लड़के स्कूल छोड़ कर काम की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख कर लेते हैं, जबकि लड़कियां उस वक्त तक अपनी पढ़ाई जा रखती हैं, जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती है.

साल कुल छात्र हिंदू प्रतिशत

2013 40992 2700 6.58

2014 43607 2075 4.75

2015 46337 1567 3.38

2016 45426 2298 5.05

2017 52115 2287 4.5

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