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जुबानी तीन बार तलाक और एक से ज्यादा शादी पर रोक लगाई जानी चाहिए : केंद्रीय कमेटी की सिफारिश

दिल्ली : भारत में ख्वातीन की सूरते हाल की जायजा करने के लिए मर्क़ज़ी हुकूमत ने जिस कमेटी की तशकील किया था, उसने सिफारिश की है कि जुबानी, एकतरफा और तीन बार तलाक के साथ ही एक से ज्यादा शादी पर रोक लगाई जानी चाहिए। एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक, यूपीए सरकार के मुद्दत में बनाई गई इस कमेटी ने गुजिश्ता साल ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, जिसमें पारिवारिक कानूनों की जायजा की गई है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पीर को तलाक के नियमों पर एक याचिका की सुनवाई करते वक़्त मर्क़ज़ी हुकूमत को अगले छह सप्ताह के अंदर रिपोर्ट पेश करने की हिदायत दिया था। सुप्रीम कोर्ट उत्तराखंड की एक खातून के ‘तीन बार तलाक’ के सिलसिले में दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रहा था। रिपोर्ट में तलाक पर रोक के लिए इस बात को बुनियाद बनाया गया है कि तलाक देने वाले लोगों की ख्वातीन अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी की सूरते हाल को लेकर महफूज़ महसूस नहीं करती हैं और उनके लिए यह एक दर्द जैसा होता है।

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कमेटी ने न सिर्फ मुस्लिम विवाह एक्ट 1939 को खत्म करने के लिए खुसूसी तर्मीम का सुझाव दिया है बल्कि आखरी गुजारा भत्ता देने की भी सिफारिश की है। समिति ने अलगाव या तलाक की हालत में खातून और उसके बच्चे को गुजारा भत्ता देने को लाज़्मी किए जाने की सिफारिश की है। हालांकि शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के अपने हुक्म में कहा था कि मुस्लिम ख्वातीन को गुजारा भत्ता का हक है। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ में इसे कभी शामिल नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बात सभी जजों को बताई जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने किस लहजे में मुस्लिम लॉ की व्याख्या की है और मुस्लिम ख्वातीन के हुकूक को हिफाज़त किया है।

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