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जेएनयू छात्र दिलीप यादव की लड़ाई में हम सबको भी उसका साथ देना चाहिए: रवीश कुमार

दिलीप यादव जेएनयू में कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठा है। कई दिनों से भूख हड़ताल के कारण उसे अस्पताल में भर्ती न कराया गया होता तो शायद ही किसी की नज़र जाती। दिलीप यादव जिस मुद्दे के लिए अपनी जान से खेल रहा है, कायदे से वे हिन्दी भाषी समाज के मुद्दे होने चाहिए थे। हिन्दी अख़बारों के ज़िला संस्करणों में इसे छा जाना चाहिए था। हिन्दी के दर्शकों के बीच पता नहीं क्या क्या दिखाकर छा जाने वाले तमाम चोटी के चैनलों को भी इसे अपना सवाल बनाना चाहिए था।

कोई इन चोटी के चैनलों के संपादकों से भी नहीं पूछता। क्या पता पूछने पर सकारात्मक जवाब भी जाए। हिन्दी के अख़बार हो या चैनल, उनके लिए हिन्दी का बाज़ार तो है मगर हिन्दी का सवाल कभी सवाल नहीं होता है। हिन्दी के प्रति न तो भाषाई प्रतिबद्धता होती है न ही हिन्दी के अवसरों के प्रति। यही हाल हिन्दी भाषी सांसदों और विधायकों का है। यूपीएससी में हिन्दी माध्यम के छात्रों का मामला गरमाया था, जब तक विरोध करने वाले छात्र लाठी न खा लिये, पानी की बौछारों से भीगा नहीं दिये गए, किसी का ध्यान नहीं गया।

तमाम तरह की शून्यताओं और अवहेलनाओं के बीच दिलीप यादव हिन्दी या भारतीय भाषाओं के छात्रों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठा है। जितना समझ आया है, उसके अनुसार पहले एमफिल और पीचडी में सत्तर अंक की लिखित परीक्षा पास करने के बाद तीस अंकों का वायवा यानी मौखिक साक्षात्कार देना होता था। पुरानी कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि अक्सर इस तीस अंक में भी हकमारी हो जाती थी। दलित और कमज़ोर तबके के ग़ैर अंग्रेज़ी छात्रों को कम नंबर मिलते थे। इसलिए इंटरव्यू तीस की जगह पंद्रह अंकों का होना चाहिए। ये तो नहीं हुआ लेकिन जेएनयू ने यूजीसी के इस आदेश को मान लिया कि लिखित परीक्षा सिर्फ क्वालिफाई करने के लिए होगी। इंटरव्यू के ही सारे अंक तय करेंगे कि आप एडमिशन के लायक हैं या नहीं। जब एडमिशन इंटरव्यू के सौ नंबर से ही तय होंगे तो लिखित परीक्षा भी बंद कर दीजिए। दिलीप यादव और अन्य छात्रों का कहना है कि इससे सुदूर ज़िलों,कस्बों के साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को मौका नहीं मिलेगा।

छात्रों को अंदेशा है कि सौ नंबर के इंटरव्यू के कारण कोई उनकी राजनीति या तार्किक सोच के कारण भी बाहर कर सकता है। भारत जैसे देश में जहां संस्थाएं सवाल न पूछने को प्रोत्साहित करती हैं वहां कोई बाग़ी तेवर का छात्र आ जाए तो उसकी किस्मत अधर में लटक सकती है। सामाजिक तौर से हम लोग संस्थाओं में रहते हुए और संस्थाओं से बाहर रहते हुए बेहद दब्बू किस्म के होने लगे हैं। हम बाहर भीतर से इसे खोखला करते चलते हैं। कायदे से यूजीसी को जेएनयू की पुरानी कमेटी के आधार पर दूसरे विश्वविद्यालयों को भी नोटिस भेजना चाहिए था कि कहीं उनके यहां भी तो इंटरव्यू में भेदभाव नहीं होता है। अंग्रेजी के कारण मराठी, बांग्ला, तमिल, उड़िया और हिन्दी के छात्रों के साथ भेदभाव होता है। हर जगह भारतीय भाषाओं के छात्र कम संभावनाओं के बीच अधिक संभावनाएं पैदा करने में मर खप जा रहे हैं।

अब सवाल ये है कि ये सवाल क्या सिर्फ दिलीप यादव का है। क्या ये सवाल बिहार का नहीं है, यूपी का नहीं है, बंगाल का नहीं है, उड़ीसा का नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय के छात्रों को संविधान निर्माताओं ने मना किया है कि तुम चुपचाप पढ़ाई करके दहेज लेने की तैयारी करना,अपनी ही तरह की दहेज देने वाली मूर्खा से शादी करना, डीजे बुलाकर डांस करना क्योंकि प्रदर्शन करना होगा तो जेएनयू वाला करेगा वर्ना प्रदर्शन नहीं माना जाएगा और प्रदर्शन होगा तो ये कहना कि जेएनयू वाले पढ़ते कब हैं, दिन भर प्रदर्शन ही करते हैं क्या। भाई मेरे, पढ़ते हैं तभी तो प्रदर्शन करते हैं न। आप जब नोटिफिकेशन नहीं पढ़ेंगे, फीस का ढांचा नहीं देखेंगे, सस्ती शिक्षा के अपने अधिकार को लेकर पढ़ाई नहीं करेंगे तो प्रदर्शन कहां से करेंगे। अरे भाई विरोध ही ज़रूरी नहीं है, किसी फैसले का समर्यथन भी तो किया जा सकता है। वहीं दिलीप यादव के सामने समर्थन में प्रदर्शन करो। कहो कि हममें से जिनकी अंग्रेज़ी ठीक नहीं है, जो अपनी भाषा में बोलने में ठीक नहीं हैं, घबरा जाते हैं, लिखते हैं तो ही बेहतर रहते हैं मगर हमारे जैसे छात्रों को एडमिशन में चांस कम हो,इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। हम सभी अपनी संभावनाओं के ख़त्म होने का समर्थन करते हैं। हम पहले भी ख़त्म थे, अब भी ख़त्म रहने का प्रण करते हैं।समर्थन में भी तो प्रदर्शन हो सकता है। वो भी क्यों नहीं होता है।

जेएनयू की एक ख़ूबी है। यहां दूर दराज़ से आने वाले अपनी अपनी भाषाओं के प्रतिभाशाली छात्रों को मौका मिलता है। अब अगर इंटरव्यू के आधार पर ही एमफिल और पीएचडी में एडमिशन होंगे तो ऐसे छात्रों को कहां से मौका मिलेगा। यही छात्र आगे चलकर पढ़ाई लिखाई से लेकर प्रशासन तक में अच्छा करते हैं। इनमें से ज्यादातर दूर दराज़ के कस्बों से आए होते हैं। महानगरों के छात्रों में भी साधारण पृष्ठभूमि के छात्र होते हैं। अस्सी के दशक में भी इस तरह की छेड़छाड़ हुई थी। नए फैसले को लेकर बहस होनी चाहिए कि आपके हित में कितना है, आपके ख़िलाफ़ कितना है।

एक बात याद रखनी चाहिए। हिन्दी का छात्र हिन्दी का छात्र होता है। वो हर जगह पाने के लिए पाने से ज़्यादा खोता चलता है। उसकी कोई भी उपलब्धि खोए हुए की लंबी सूची के बग़ैर नहीं होती है। ख़ुद हिन्दी माध्यम का छात्र रहा हूं और इसी भाषा का पत्रकार तो हर पल एक खाई लांघनी पड़ती है। आप प्राप्ति के शिखर पर भी वंचित की तरह खड़े होते हैं। यह अनुभव हिन्दी का ही नहीं है। बांग्ला, तमिल, उड़िया और मराठी छात्रों का भी है। फिर भी अंग्रेज़ी के वर्चस्व के ख़िलाफ़ भारतीय भाषाएं कभी एकजुट नहीं हो पाती हैं। उनकी ट्रेनिंग आपस में बंटने की है, एकजुट होकर लड़ने की नहीं है। इसीलिए दिलीप यादव अकेला है। जेएनयू के छात्र साथ दे रहे हैं मगर हिन्दी या भारतीय भाषाओं का समाज चुप है। हिन्दी का नाम लेने वाली सरकारें भी उसी संदर्भ में लेती हैं जब इसके सहारे दूसरी भाषाओं से टकराव की संभावना हो। दूसरी भारतीय भाषाओं पर दबदबा बनाए रखने या धमकाने के लिए हिन्दी का इस्तमाल कर लिया जाएगा मगर जहां हिन्दी के मूल सवाल होंगे वहां हर कोई चुप रहेगा। दिलीप यादव को अपनी सेहत का ख़्याल रखना चाहिए। अकेले की लड़ाई तकलीफदेह होती है।

(ये आर्टिकल NDTV  के सीनियर पत्रकार रवीश कुमार द्वारा लिखा गया है)

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