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झारखंड बनने के बाद 1000 से अधिक डीड फरजी बने

रांची : रियल एस्टेट से जुड़े कारोबारियों के अनुसार, झारखंड बनने के बाद रांची के अलग-अलग मौजा में जमीन के लगभग 1000 फरजी डीड बनाये गये हैं. कई मामलों में तो दूसरों की जमीन के डीड की कॉपी कर इसे तैयार कर लिया गया.  अधिकतर मामलों में आदिवासी जमीन के खतियान के आधार पर फरजी डीड तैयार कर दिया गया. यहां तक कि उसे वॉल्यूम में जोड़ (इंट्री) भी दिया गया. बड़ी साजिश कर 1932 के आदिवासी खतियान की  जमीन को सामान्य में बदलने का खेल  हुआ. सूत्रों का कहना है कि गहन जांच से फरजी डीड के मामले और बढ़ सकते हैं.
फरजी डीड पर 1945-46 से पहले की तिथि : इन फरजी डीड पर 1945-46 यानी जमींदारी प्रथा समाप्त होने के पहले की तिथि अंकित की
गयी है. इसमें दिखाया गया है कि 1932 के सर्वे में जमीन आदिवासी खाते की थी, जबकि जमींदार कोई और था. जमींदारी प्रथा समाप्त होने के पहले आदिवासियों ने जमींदार के पास अपनी जमीन सरेंडर कर दी. फिर उसे जमींदार ने सामान्य वर्ग को हुकुमनामे के माध्यम से लिख दिया.  इस तरह आदिवासी खाते की जमीन को जमींदारी प्रथा समाप्त होने के पहले से ही सामान्य जाति का दिखा दिया गया. इतना ही नहीं, जमींदारी प्रथा उन्मूलन के  बाद तैयार मास्टर फॉर्म (एम फॉर्म) को भी गायब कर दिया गया, ताकि यह पता नहीं चले कि आदिवासी जमीन का इस्तीफा  नहीं हुआ था.
ऐसे तैयार हुआ फरजी डीड
वर्ष 2001 के बाद रजिस्ट्री कार्यालय के कर्मचारियों की मिलीभगत से सारा काम हुआ. सबसे ज्यादा गड़बड़ी 2007 के बाद हुई. दो तरह से फरजी डीड बने. उस समय रजिस्ट्री कार्यालय में  बाहरी लोगों का भी प्रवेश धड़ल्ले से हो रहा था.
1.  बिचौलियों और कर्मियों की सांठगांठ से वास्तविक जमीन मालिक के डीड की तरह ही नया डीड तैयार कराया गया. चूंकि मूल डीड हस्तलिखित था और रजिस्ट्री कार्यालय में था. ऐसे में उसकी कॉपी हाथों से लिख कर ली गयी. कॉपी के बाद वास्तविक जमीन मालिक का मूल डीड रजिस्ट्री कार्यालय से गायब कर दिया गया. फिर उसी वॉल्यूम, पन्ने व तिथि पर   फरजी तरीके से तैयार डीड को शामिल कर लिया गया.  इसके आधार पर दाखिल खारिज करा कर रसीद भी कटा ली और जमीन भी बेच दी गयी. चूंकि डीड हस्तलिखित होते थे, इसलिए यह काम आसानी से कर लिया गया. जब वास्तविक मालिक ने आपत्ति की और अपना मूल डीड निकालना चाहा, तो वह गायब मिला. वहीं, नकल के लिए आवेदन देने पर फरजी तरीके से तैयार डीड की कॉपी मिली. इस तरह बड़ा घोटाला हुआ.
2. कई मामलों में आदिवासियों के खतियान के आधार पर इस्तीफा दिखाते हुए नया डीड तैयार किया गया. इस डीड के लिए नया वॉल्यूम भी तैयार कर लिया गया. हाल ही में वरीय अधिकारियों ने एक-दो मामले की जांच रजिस्ट्री अॉफिस में जाकर की, तो आश्चर्यचकित रह गये.   1945-46 या इसके आसपास के साल की कई डीड पुराना लग ही नहीं रहा हैं. कागजात ऐसे लग रहे हैं, जैसे दो-चार साल पहले ही तैयार कराये गये हों.
कर्मियों पर हुई थी प्राथमिकी भी
रजिस्ट्री  अॉफिस में दस्तावेज छेड़छाड़ के मामले पर यहां के कर्मचारियों पर पूर्व  में प्राथमिकी भी दर्ज हुई थी. यहां कार्यरत महादेव उरांव, साबीर व रोपना  उरांव को अभियुक्त बनाया गया था.

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