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टाटा स्टील : जमशेदपुर के लोगों से कमाया पैसा, यूरोप में गंवाया

जमशेदपुर : टाटा स्टील ने जब साल 2007 में जब इंगलिश-डच स्टील मेकर कंपनी कोरस को खरीदा तो पूरी दुनिया में टाटा स्टील का डंका बजने लगा था. लेकिन यह सौदा घाटे का साबित हुआ. टाटा स्टील ने भारत में भरपूर मुनाफा कमाया और उसे कोरस में इन्वेस्ट करती गयी. लेकिन नौ साल में कंपनी ने कुल 69 हजार 300 करोड़ रुपये का घाटा दिया. इसमें से टाटा स्टील की तरफ से यूरोप के बाजार से लिये गये 21,820 करोड़ रुपये भी शामिल हैं. इसके बाद मुल्क की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली टाटा स्टील कंपनी की शोबीया एक कर्जदार कंपनी के तौर में बन गयी. करीब 70 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने के बाद टाटा स्टील की आंखें खुली और अब कोरस को बेचने का फैसला लिया गया.

1907 से टाटा स्टील जमशेदपुर में लगातार मुनाफा कमाती रही है. क्योंकि तब तक टाटा स्टील का भारत में कोई दूसरा प्लांट नहीं था. 2007 में कोरस का अधिग्रहण और 2016 में कलिंगानगर (ओड़िशा) के प्रोडक्शन को छोड दिया जाये तो टाटा स्टील जमशेदपुर से ही मुनाफा कमाती रही. और जमशेदपुर से कमाये गये पैसों को कोरस लेने के बाद से यूरोप में गंवाती रही.

स्टील इंडस्ट्री की हालत देखते हुए टाटा के लिए कोरस का खरीदार तलाशना बेहद मुश्किल होगा. साल 1990 के दशक में ब्रिटेन की जीडीपी में स्टील का कॉन्ट्रिब्यूशन 0.5% था, जो अब 0.1% रह गया है. बीते 25 साल में जीडीपी का साइज 62% बढ़ा, लेकिन स्टील इंडस्ट्री 24% घट गई.

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कोरस को खरीदना किसी भारतीय कंपनी की विदेश में सबसे बड़ी डील थी. इससे टाटा स्टील की कैपेसिटी 87 लाख टन से बढ़कर 2.5 करोड़ टन हो गई थी. डील के बाद टाटा स्टील दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन गई थी. फॉर्च्यून 500 में शामिल होने वाली यह पहली भारतीय कंपनी बनी.

कोरस को बेचने के फैसले को टाटा स्टील के अहम से लेकर उसकी पहचान से भी जोड़कर देखा जा रहा है. शेयरधारकों ने टाटा स्टील पर मुसलसल दबाव बनाये रखा. कई बार एजीएम में भी इसे लेकर हंगामा हुआ. जिसके बाद बोर्ड ने कोरस को बेचने का फैसला लिया.

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