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डॉ. रोशन जहाँ जिसके ट्रेन हादसे ने पैर तो छीन लिए लेकिन हौसला न छीन सका

एक कततद मुस्लिम परिवार जहाँ बेटियों को कुछ ज़्यादा करने की आज़ादी नहीं थी में पैदा होना, एक ट्रेन हादसे में अपनी दोनों टांगें खो देना, उर्दू माध्यम स्कूल में पढ़े होना और पैसे की तंगहाली कुछ ऐसी वजहें हैं जिनका हवाला देकर कोई भी अपने नाकामयाब होने की कहानी आसानी से बयान कर सकता है और ज़्यादातर लोग इस दर्द भरी कहानी को मद्देनज़र रखते हुए शायद इसे ख़ुदा की मर्जी भी समझ लेंगे।

लेकिन कहते हैं जिनके हौसले बुलंद हों उनके रास्ता कोई भी मुश्किल कोई भी दीवार नहीं रोक सकती, ऐसे लोगों को तो पर्वत भी झुक कर सलाम करते हैं।

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कुछ ऐसी ही कहानी है 23 साल की डॉ: रोशन जहां की, जिन्होंने इन तमाम मुसीबतों और दिल तोड़ देने वाले हादसे के बाद भी हिम्मत न हारते हुए वो मुकाम हासिल कर दिखाया जो बहुत से लोग तमाम सहूलियतों के बावजूद भी नहीं हासिल कर पाते। रोशन जहां के मुश्किलों भरा दौर बचपन से ही शुरू हो चूका था जब तंगहाली भरे परिवार में उसकी परवरिश हुई। उर्दू माध्यम से अपनी स्कूली तालीम हासिल करने वाली रोशन जहां का सपना एक डॉक्टर बनने का था जो उसके परिवार वालों को उस वक़्त चूर-चूर होता नज़र आया जब अक्टूबर 2008 में अँधेरी से जोगेश्वरी जा रही एक ट्रेन से गिरकर रोशन अपनी दोनों टांगें गँवा बैठी। लेकिन इस हादसे से रोशन बिलकुल नहीं टूटी बल्कि और भी मजबूती से आगे बढ़ी।

रोशन की मेहनत और लगन के चलते उसने एमएचसीईटी का एग्जाम पास कर एमबीबीएस में दाखिल लिया। दाखिल लेने में आई मुसीबतों का ज़िक्र करते हुए रोहन ने बताया कि कैसे उन्हें कॉलेज ने अपंगता की वजह से दाखिल देने से मना कर दिया था और कोर्ट में केस लड़ने के बाद उन्हें दाखिल दिया गया।

अपनी स्पीच में रोशन जहाँ ने अपनी माँ को अल्लाह का दूसरा रूप बताया है और कहा है कि आज वो जो भी है उन्हीं की बदौलत है।

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