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जानिए डोपिंग टेस्ट की एबीसीडी, अब तक फंस चुके हैं 500 खिलाड़ी

डोपिंग कोई नई बात नहीं है. मुकाबले में दूसरों को हराने के लिए प्राचीन ग्रीक खिलाड़ियों के भी ऐसा करने की कहानियां हैं. एक खिलाड़ी का करियर आम तौर पर काफी छोटा होता है. अपने सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में होने के समय ही वे अमीर और मशहूर हो सकते हैं. इसी जल्दबाजी में कुछ खिलाड़ी अक्सर डोपिंग के जाल में फंस जाते हैं. बीजिंग ओलिंपिक में पदक जीतने वाले चार खिलाड़ियों के डोपिंग में पॉजीटिव पाए जाने के कारण पदक छीन लिए गए थे. इन चार खिलाड़ियों में तीन रूस के थे. इन सभी के 2008 में लिए गए डोपिंग नमूने की फिर से जांच की गई, जिसमें इन्हें डोपिंग का दोषी पाया गया. पांच अगस्त से रियो में होने वाले ओलम्पिक खेलों में डोपिंग रोधी कार्यक्रम के तहत 4,500 मूत्र और 1,000 खून के नमूनों के परीक्षण किए गए थे।

यूके डोपिंग एजेंसी से मुताबिक इन पदार्थों को तब ही प्रतिबंधित किया जाता है जब ये तीन मुख्य मानदंडों में से दो में शामिल हों। ये मानदंड हैं-

अ. ड्रग्स अगर खिलाड़ी का प्रदर्शन बढ़ाता हो।
ब. इससे खिलाड़ी का स्वास्थ्य बिगड़ने का खतरा हो।
स. या खेल की गरिमा का उल्लंघन करता हो।

2. कितने प्रकार के प्रतिबंधित ड्रग्स वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे हैं?:

खिलाड़ियों के द्वारा सबसे सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले पदार्थ एंड्रोजेनिक एजेंट्स जैसे एनाबोलिक स्टेरोइड्स हैं। इसके सेवन से खिलाड़ी खूब मेहनत करके ट्रेनिंग कर पाता है। अपनी चोट से जल्दी उबर पाता है और जल्दी ही अपने शरीर को सुडौल बना लेता है। लेकिन इसके कारण किडनी में क्षति होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। साथ ही खिलाड़ी आक्रामक हो जाता है। अन्य दुष्प्रभाव हैं जैसे खिलाड़ी के लगातार बाल झड़ना और उसका स्पर्म काउंट कम हो जाना। एनाबोलिक स्टेरोइड्स का या तो टेबलेट के रूप में सेवन किया जाता है या इंजेक्शन को मांसपेशियों में लगाकर।

इसके बाद नाम आता है स्टीमुलेंट्स का। इसके सेवन से खिलाड़ी ज्यादा चौंकन्ना हो जाता है और दिल की धड़कने व खून के बहाव के तेज होने से थकान कम हो जाती है। यह एक बहुत खतरनाक ड्रग है जिसके सेवन से एथलीट को दिल का दौरा भी पड़ सकता है।

तीसरे बैन ड्रग का नाम है डाइयूरेटिक्स और मास्किंग एजेंट्स। इस ड्रग का इस्तेमाल खिलाड़ी शरीर से तरल पदार्थ को कम करने के लिए करते हैं ताकि पहले इस्तेमाल किए गए ड्रग के इस्तेमाल को छिपाया जा सके। इस ड्रग का इस्तेमाल खिलाड़ी बॉक्सिंग या घुड़सवारी में करते हैं।

नारकोटिक अनाल्जेसिक्स और कैन्नाबिनोइड्स का इस्तेमाल खिलाड़ी थकान व चोट से होने वाले दर्द से निजात पाने के लिए करते हैं। लेकिन इसके इस्तेमाल से चोट और भी खतरनाक हो जाती है। यह भी एक नशे की लत है। मार्फीन और ऑक्सीकोडोन जैसे पदार्थों पर प्रतिबंध है लेकिन ओपिएट-डिराइव्ड पेनकिलर का इस्तेमाल करने की अनुमति है।

इसके बाद नाम आता है पेपटाइड हार्मोन्स का। इसमें कुछ पदार्थ होते हैं जैसे ईपीओ(erythropoietin)- यह विस्तृत रूप से खिलाड़ी की मजबूती, रक्त कोशिकाओं की संख्या को बढ़ाता है जिससे खिलाड़ी को एनर्जी मिलती है और HGH (human growth hormone) बनते हैं और मांसपेशियां बनती हैं।

सबसे कम जाना जाने वाली ड्रग ब्लड डोपिंग है। जिसमें शरीर से खून निकाला जाता है और बाद में इंजेक्शन के सहारे शरीर में डाला जाता है ताकि ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाया जा सके। ग्लूकोकॉर्टिकॉइड्स की प्रकृति एंटी- इन्फ्लेमेटरी होती है इससे गंभीर चोट से बचने में मदद मिलती है। लेकिन यह कार्बोहाइड्रेट्स के मेटोबोलिज्म, फैट और प्रोटीन और ग्लाइकोजिन और ब्लड प्रेशर स्तर को नियंत्रण में रखता है।

बेटा ब्लॉकर्स, का इस्तेमाल भी आजकल एथलीट ड्रग के रूप में कर रहे हैं। यह एक प्रतिबंधित ड्रग है। इस दवाई का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर और दिल का दौरा रोकने के लिए किया जाता है। यह दवाई तीरंदाजी और शूटिंग में बैन है। इस दवाई के इस्तेमाल से दिल की गति कम रहती है और हाथ शूटिंग करने के दौरान हिलते नहीं हैं।

खिलाड़ी के शरीर में डोपिंग की जांच के लिए एक लंबे समय से स्थापित तकनीकी मास स्पेक्ट्रोमेट्रीका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अंतर्गत खिलाड़ी के यूरिन सैंपल को आयोनाइज करने के लिए इलेक्टॉन्स से फायर किया जाता है इससे अणुओं को चार्ज्ड पदार्थ में परिवर्ति कर दिया जाता है इलेक्ट्रॉन्स को जोड़कर व हटाकर।

जितने भी पदार्थ सबमें एक सबसे अलग ‘फिंगरप्रिंट’ होता है। जैसा कि वैज्ञानिकों को पहले से ही कई स्टेरॉइड्स का भार पता होता है इसलिए वह तुरंत पहचान जाते हैं कि डोपिंग वाला सेंपल कौन सा है। लेकिन ये तरीका बहुत पेचीदा है। कुछ डोपिंग के बाई- प्रोडक्ट इतने छोटे होते हैं कि उनसे इतने सिग्नल ही नहीं मिलते कि उन्हें डिटेक्ट किया जा सके। ब्लड टेस्टिंग के माध्यम से ईपीओ और सिनथेटिक ऑक्सीजन कैरियर्स को जांचा जा सकता है लेकिन ब्लड ट्रांसफ्यूजन को कतई नहीं जांचा जा सकता। इस तरह से ब्लड ट्रॉसफ्यूजन को जांचने के लिए एक नया सिस्टम है जिसका नाम बायोलॉजिकल पासपोर्ट है। साल 2009 में वाडा में लाए गए पासपोर्ट से डोपिंग के प्रभाव को जांचा जा सकता है।

कानूनी हद : बीमार आदमी के लिए दवा जरूरी हो सकती है लेकिन एथलीट जब दवा लेते हैं तो उसके असर और इस्तेमाल के कानूनी पहलू पर ध्यान देना होता है. जैसे कि दर्दनाशक दवाई इबुप्रोफेन की जगह अगर कोई खिलाड़ी मॉर्फीन का इस्तेमाल करे तो वह डोपिंग की श्रेणी में आएगा. क्योंकि वह आम दवा से कहीं भारी और नशीली है और उस पर प्रतिबंध है.

स्टीरॉयड : डोपिंग में आने वाली दवाओं को पांच श्रेणियों में रखा गया है जिनमें स्टीरॉयड सबसे आम हैं. हमारे शरीर में स्टीरॉयड पहले से ही पाया जाता है लेकिन कुछ पुरुष एथलीट मांसपेशियां और पौरुष बढ़ाने के लिए स्टेरॉयड के इंजेक्शन लेते हैं. इसके साइट इफेक्ट के तौर पर पुरुषों में स्तनों का उभरना एवं हृदय और तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर देखा गया है.

उत्तेजक पदार्थ : उत्तेजक पदार्थ शरीर को चुस्त और दिमाग को तेज कर देते हैं. इनका इस्तेमाल प्रतियोगिता के दौरान प्रतिबंधित हैं लेकिन कुछ खिलाड़ी इसे खेल से पहले लेते हैं जिससे शरीर में ज्यादा ऊर्जा का संचार होता है. 1994 फुटबॉल विश्व कप के दौरान अर्जेंटीनियाई खिलाड़ी मैराडोना ऐसे ही उत्तेजक पदार्थ एफेड्रीन के इस्तेमाल के दोषी पाए गए थे.

पेप्टाइड हार्मोन : स्टीरॉयड की ही तरह पेप्टाड हार्मोन भी शरीर में मौजूद होते हैं. इसलिए इनका अलग से सेवन शरीर में असंतुलन पैदा करता है. डायबिटीज के मरीजों के लिए जीवन रक्षक हार्मोन इंसुलिन को अगर स्वस्थ व्यक्ति ले तो शरीर से वसा घटती है और मांसपेशियां बनती हैं. इसके ज्यादा इस्तेमाल से शरीर में ग्लूकोज का स्तर अचानक काफी घट सकता है. ऐसे में शरीर जल्दी थकता है और हार्मोनों का तालमेल बिगड़ता है.

नार्कोटिक्स : नार्कोटिक या मॉर्फीन जैसी दर्दनाशक दवाइयां डोपिंग में सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं. इनके इस्तेमाल से बेचैनी, थकान और नींद जैसे लक्षण हो सकते हैं. सिर दर्द और उल्टी भी इनसे होने वाले नुकसान हैं. इनकी लत पड़ने की भी काफी संभावना होती है. कई बार इन दवाइयों के सेवन से यह भी मुमकिन है कि खिलाड़ी खुद को कम दर्द के अहसास में ज्यादा चोटिल कर लें.

डाइयूरेटिक्स : डाइयूरेटिक्स के सेवन से शरीर पानी बाहर निकाल देता है जिससे कुश्ती जैसे खेलों में कम भार वाली श्रेणी में घुसने का मौका मिलता है. डाइयूरेटिक्स का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में होता है. लेकिन अगर शरीर से अचानक पानी बाहर निकल जाए तो रक्तचाप भी कम हो जाता है. ब्लडप्रेशर घटने से रक्त संचार तंत्र सही ढंग से काम नहीं कर पाता और व्यक्ति अचानक बेहोश भी हो सकता है.

ब्लड डोपिंग : ब्लड डोपिंग एक दशक पहले ही पकड़ में आई. आम तौर पर ब्लड कैंसर के मरीजों का खून समान ब्लड ग्रुप के खून से बदलना पड़ता है. ऐसे मरीजों के लिए किशोरों का खून सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि उसमें लाल रुधिर कणिकाओं की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे शरीर में ज्यादा ऊर्जा का संचार होता है. लेकिन कुछ खिलाड़ी प्रदर्शन बेहतर करने के लिए किशोरों का खून चढ़ाते रहे, जिसे ब्लड डोपिंग कहा जाता है.

डोपिंग का भविष्य : वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी और जर्मनी की नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी, डोपिंग को रोकने के लिए इससे होने वाले नुकसान के बारे में जागरुकता फैलाने का काम कर रही हैं. वे दवाइयों की कंपनियों के साथ इसकी जांच के तरीके निकालने और काला बाजारी पर कानूनी रोकथाम की भी कोशिश कर रही हैं.

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