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तबाही के कगार पर बिहार का किसान, नोट संकट के साथ हो सकता है अन्न संकट

तसनीफ अंसारी-पटना: बिहार का सीमांचल क्षेत्र में पूर्णिया,अररिया किशनगंज और कटिहार जिले मक्का उत्पाद के लिए न केवल भारत में बल्कि विश्व में प्रति हेक्टर मक्का उत्पादन में अपना एक अलग मुकाम रखता है, यहाँ से भारी मात्रा में मक्का का निर्यात होता है. नकदी फसल के रूप में किसानों की एक मात्र आमदनी का मुख्य स्रोत है. लेकिन नोटबंदी से यहाँ के किसान तबाही के कगार पर पहुँच चुके है. मक्का और गेहूं की बुआई के लिए खेत तैयार है, मगर उर्वरक व बीच दुकानों पर हजार व पांच सौ के पुराने नोटों को नहीं लिए जाने के कारण किसानों को उर्वरक व बीज नहीं मिल पा रहा है.

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किसानों के मुताबिक, बीज, उर्वरक समय से मुहैया नहीं होने से फसल पछ्तिया होगी, जिसका पैदावार पर काफी असर पड़ेगा. इसी चिन्ता ने किसानों की नींद उड़ा दी है.
पांच सौ और एक हजार के नोट बंदी के बाद फसलों के बुवाई का संकट अन्नदाताओं के सामने खड़ा हो गया है.
नोट बंदी के बाद न तो मंडी में किसान अपनी धान की फसल को बेच पा रहे हैं और न ही खेतों में बुवाई के लिए मक्का व गेहूं के बीज और उर्वरकों को ही खरीद कर पा रहे हैं. इससे उनकी चिंता बढ़ती जा रही है. नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा समाप्त होने को है, लेकिन अब तक किसान गेहूं की बुवाई शुरू नहीं कर पाए हैं.
आप को बता दें की मक्का की रोपनी का उपयुक्त समय नवम्बर का महीना ही होता है. रबी की फसल गेहूं के लिए भी किसानों के साथ यही समस्या है. कहीं ऐसा न हो कि नोट संकट के साथ-साथ देशवासियों को अन्न संकट का भी सामना करना पड़े.

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