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तारीख़ी पुराना पुल पर भी नाजायज़ क़बज़े , पहलवान का राज

हैदराबाद शहर ज़माना-ए-क़दीम ही से हर बदलते हुए रुजहान के साथ साथ रहा । ख़ासकर यहां के हुकमरानों ने रियाया का ज़्यादा और ख़ास ख़्याल रखा ।

हैदराबाद शहर ज़माना-ए-क़दीम ही से हर बदलते हुए रुजहान के साथ साथ रहा । ख़ासकर यहां के हुकमरानों ने रियाया का ज़्यादा और ख़ास ख़्याल रखा ।

चाहे वो नक़ल-ओ-हमल का मुआमला हो या फिर अवाम के लिए पुख़्ता सड़कों , शिफ़ा ख़ानों की तामीरकी बात हो हुक्मराँ सरकारी ख़ज़ानों के मुंह खोल देते थे और रियाया की सहूलत का हर मुम्किन ख़्याल रखते थे ।

तामीर में भी दियानतदारी थी जिस की वजह से क़ुतुब शाही और आसिफ़ जाहि दूर हुक्मरानी के ख़ातमा के बाद जब कि सब कुछ बदल गया उन की बनाई हुई सड़कें इन का तामीर करदा तारीख़ी पुराना पुल , दवाख़ाना और तालीमी इदारे आज भी अवाम को फ़ायदा पहुंचा रहे हैं ।

आज के हुकमरान जो भी काम करते हैं इस में सिर्फ मुफ़ाद होता है । क़ारईन ऐसा ही कुछ शहर के क़दीम और तारीख़ी पुल यानी पुराना पुल का रास्ता एक मुकम्मल बाज़ार में तबदील हो चुका है ।

पुराना पुल पर मुकम्मल तौर पर पहलवानों का राज है । पुल पर सब्ज़ी , मेवाजात और कपड़ों की दुकानें लग गई हैं । यही नहीं बल्कि यहां क़दम क़दम पर लोग बंडियों और ठेलों पर भी सामान फ़रोख़त करते हैं । एक शख़्स चोरी छिपे नाजायज़ तौर पर कशीदा शराब भी फ़रोख़त करता है ।

और एक हैरतअंगेज़ बात है कि एक पहलवान जो मुक़ामी बताया जाता है । तहा बाज़ारी के नाम पर हर बंडी ठेले से 20 रुपय यौमिया और हर दुकान से 40 रुपय वसूल करता है । यहां तक़रीबन 90 दुकानें हैं । पहलवान के आदमी रोज़ाना बाक़ायदगी से सुबह ही ये तहा बाज़ारी वसूल करलेते हैं कारोबार करने वाले बड़ी ख़ामोशी से देते हैं ।

ये पहलवान बलदिया के नाम पर ही सब कुछ करता है जब कि तहा बाज़ारी का राज कभी का ख़तन होचुका है । महिकमा बलदिया भी पहले से ही बदनाम महिकमा है इस वक़्त मज़ीद बदनामी हो रही है । इस पुराना पुल से बिलकुल मुत्तसिल एक और पल भी है जिस को क़ुली क़ुतुब शाह पुल का नाम दिया गया है ।

साबिक़ चीफ़ मिनिस्टर एन जनार्धन रेड्डी ने 28 फरवरी 1992 को इस का इफ़्तिताह किया था । उस वक़्त से आज तक क़दीम तारीख़ी पुराना पुल को आम ट्रैफ़िक के लिए बंद करदिया गया है । अब पुराना पुल को एक ही तबक़ा ( पारडी ) के लिए गोया रख छोड़ा गया है ।

यहां आज भी एक पहलवान मामूल वसूल करता है । यही कुछ कम नहीं था कि अब क़ुली क़ुतुब शाह पुल पर भी आहिस्ता आहिस्ता इस तबक़ा ने ठेला बंडियों से इस जगह को घेर कर यहां एक और बाज़ार शुरू करदिया है जहां सीताफल फ़रोख़त किया जा रहा है ।

इस मसरूफ़ और पर हुजूम पुल पर इस तरह ऐन दरमयान में कारोबार करना किसी भी लिहाज़ से दरुस्त नहीं है । राहगीरों को सख़्त मुश्किलात पेश आरही हैं । जब कि पुल पर रात दिन ट्रैफ़िक पुलिस चाला नात करने के लिए मौजूद रहती है । ग़ौर से इस ज़ेर नज़र तस्वीर को देखिए कि एक पुलिस ऑफीसर कैसे मेवे की नाजायज़ दुकान से जो पुल के दरमयान लगाई गई है बड़े आराम से बैठे हुए हैं ।

इस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है ऐसे ही लोगों की सरपरस्ती जो क़ानून के मुहाफ़िज़ कहलाते हैं किस तरह से क़ानूनशिकनी होती है । हम ने एक ठेला वाले से बात की इस ने बताया कि पुल के दरमयान हमें कारोबार करने की इजाज़त मिल जाती है । अलबत्ता मेहरबानी करने वालों पर हमें भी मेहरबानी करनी पड़ती है ।

इन का ख़्याल रखना पड़ता है तब ही तो हम कारोबार के लिए हिम्मत से खड़े रहते हैं । इंसाफ़ पसंद अवाम के ख़्याल में ऐसा सिर्फ ज़िम्मेदार ओहदेदारों की मानी ख़ेज़ ख़ामोशी से होता है । पुराना पुल तारीख़ी एहमीयत का हामिल है इबराहीम क़ुली क़ुतुब शाह ने ज़ाइद अज़ 450 बरस क़बल उस को तामीर करवाया था ।

उस वक़्त गोलकुंडा क़िला और नए बनाए गए शहर को जोड़ने वाला ये वाहिद पल था । उन्हों ने भी कभी ना सोंचा होगा ये पल एक दिन मार्किट या बाज़ार बन जाएगा । जिस पर एक पहलवान का राज होगा ।

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