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तालिबान से हुकूमत-ए-पाकिस्तान की बातचीत रोकने अदालत में दरख़ास्त

ईस्लामाबाद 30 मई: एक पाकिस्तानी सहाफ़ी ने सुप्रीम कोर्ट में दरख़ास्त पेश करते हुए गुज़ारिश की है कि मुंतख़बा हुकूमत और फ़ौज को तालिबान के साथ मुज़ाकरात के इनइक़ाद या रवाबित पैदा करने की किसी भी कोशिश से बाज़ रहने की हिदायत दी जाये।

ईस्लामाबाद 30 मई: एक पाकिस्तानी सहाफ़ी ने सुप्रीम कोर्ट में दरख़ास्त पेश करते हुए गुज़ारिश की है कि मुंतख़बा हुकूमत और फ़ौज को तालिबान के साथ मुज़ाकरात के इनइक़ाद या रवाबित पैदा करने की किसी भी कोशिश से बाज़ रहने की हिदायत दी जाये।

दरख़ास्त में कहा गया है कि दस्तूर में ऐसी किसी भी कार्रवाई की मन किया गया है। आज़ाद पेशा सहाफ़ी शाहिद औरकज़ई ने कल दरख़ास्त पेश करते हुए सदर नशीन जवाईंट चीफ़स आफ़ स्टाफ़ कमेटी और इंटर सरवेसस इंटेलिजेंस के सरबराह को मुद्दई अलीहान(पक्ष बनाया) क़रार दिया गया है।

जर्नलिस्ट ने सुप्रीम कोर्ट से ख़ाहिश की है कि इन दोनों अफ़राद को हिदायत दी जाये कि वो उन अफ़राद की निशानदेही करें जिन के ज़रिये वो तालिबान से रब्त पैदा कर रहे हैं।

दरख़ास्त गुज़ार ने कहा कि दुश्मन और सयासी / मज़हबी , अफ़राद / पार्टीयां जो दुश्मन के साथ अमन के क़ियाम की वकालत कररही हैं, उन्हें दरमयानी आदमीयों के नाम ज़ाहिर करने चाहिऐं।

औरकज़ई ने इद्दिआ किया है कि सुप्रीम कोर्ट को चाहीए कि एसे किसी भी इक़दाम को फ़ौरी रोक दे जो दस्तूर की ख़िलाफ़वरज़ी में हो और इस से मुल्क की सलामती की एहमीयत और मुसल्लह अफ़राद का डिसिप्लिन मुतास्सिर होता हो।

रोज़नामा डेली टाईम्स की ख़बर के बमूजब अदालत की तवज्जा जंग करने वाले सिपाहीयों की हालत-ए-ज़ार की तरफ मबज़ूल करवाई गई है और कहा गया हैके फ़ौज की गिरिफ़त असलाह पर कम होती जाएगी।

जब उसे मालूम होगा कि ख़ूँरेज़ी के मुआमला पर भी मुल्क के आइन्दा वज़ीर-ए-आज़म सौदेबाज़ी करना चाहते हैं। दरख़ास्त गुज़ार ने कहा कि मुसल्लह अफ़्वाज ने मुल्क की सरज़मीन के किसी हिस्सा या अराज़ी को अस्करीयत पसंदों के क़बज़ा में जाने नहीं दिया है।

अदालत को चाहिए कि सरबराह फ़ौज से इस के बारे में नुक़्ता-ए-नज़र तलब करे। सरकारी पालिसी जंग के बारे में अचानक बरअक्स होगई है।

हालाँकि कई जानें ज़ाए हो चुकी हैं। शाहिद औरकज़ई ने सवाल किया कि क्या मुसल्लह अफ़्वाज सुलह की पेशकश करसकती हैं या दुश्मन से दुश्मनी तर्क करसकती हैं।

हालाँकि दुश्मन सरज़मीन पाकिस्तान की हदूद में ही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या पाकिस्तान का दस्तूर किसी शहरी को ये इख़तियार देता हैके हकूमत-ए-पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग करनेवाली किसी भी ख़ानगी फ़ौज से अमन की बातचीत करे।

दरख़ास्त में फ़ौरी तौर पर सयासी / मज़हबी अनासिर की इस दोगली पालिसी को रोक देने की गुज़ारिश की गई है और कहा गया हैके ये तक़रीबन ख़ुदसपुर्दगी के मुतरादिफ़ होगा।

जबके पाकिस्तानी फ़ौज ख़ून में नहा रही है। ये अनासिर दरहक़ीक़त तालिबान की मज़हबी और अख़लाक़ी फ़तह चाहते हैं और अमली एतेबार से इस्लामी जमहूरीया से तर्क-ए-ताल्लुक़ करचुके हैं।

फ़ौरी तौर पर ये मालूम नहीं हो सका कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने दरख़ास्त समाअत के लिए कुबूल करली है।

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