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तालीमी पसमांदगी की वजह से मुसलमान माशी तरक़्क़ी से महरूम

चेन्नई: चीफ़ मिनिस्टर जम्मू-कश्मीर मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने आज कहा है कि मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी उनकी माशी तरक़्क़ी में रुकावट बन गई है। जबकि किसी भी क़ौम की तरक़्क़ी के लिए तालीम का कलीदी रोल होता है। यूनाईटेड इकनॉमिक फ़ोर्म के इजतिमा से मुख़ातिब करते हुए उन्होंने कहा कि इस में कोई बशबा नहीं है कि तालीमी पसमांदगी की वजह से हम माशी तरक़्क़ी हासिल करने से क़ासिर हैं और मेरा ये ईम्क़ान है कि हमारी बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए तालीम में कलीदी एहमीयत रखती है।

मुफ़्ती सईद ने बताया कि मुसलमानों की समाजी । माशी और तालीमी इन्हितात 18 वीं सदी के अवाइल से शुरू हो गई थी। जिसके पेश-ए-नज़र सर सय्यद अहमद ख़ां और मौलाना अब्बूल-कलाम आज़ाद जैसे क़ाइदीन ने तरक़्क़ी के लिए तालीम को नागुज़ीर क़रार दिया था।

तालीम की एहमियत और इफ़ादियत को महसूस करते हुए सर सय्यद ने महमडन ऐंगलो ओरीएंटल कॉलेज का क़ियाम अमल में लाया था जो कि तरक़्क़ी करते हुए अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी की शक्ल इख़तियार करती है। मौलाना आज़ाद का ये ईम्क़ान भी है कि सैकूलर हिन्दुस्तान में हुसूल-ए-तालीम के ज़रिये मुसलमान ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं।

चीफ़ मिनिस्टर ने बताया कि मज़हब में जदीद तालीम के हुसूल पर मना नहीं किया गया और अपनी मिसाल पेश की कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से क़ानून की डिग्री हासिल करने से क़बल उन्होंने मदर्रिसा में तालीम पाई थी।

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