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दक्षिण भारत के मंदिरों में ‘छोटी बच्चियां सार्वजनिक संपत्ति व होता है यौन शोषण’

चेन्नई : दक्षिण भारत के मंदिरों में छोटी बच्चियों को “देवदासी” के रूप में रखने की परंपरा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इन बच्चियों के शोषण का जरिया बताया है. आयोग का कहना है कि उन्हें दास बना कर रखा जाता है. परंपरा के नाम पर 7 से 10 साल की उम्र की सैकड़ों लड़कियों को त्यौहार के दौरान मंदिर में ही रहना होता है. इन लड़कियों को तमिलनाडु के कई इलाकों में मठम्मा कहा जाता है और इनके शादी करने पर रोक होती है. इन्हें अपनी जीविका हिंदू मंदिरों में नाच कर चलानी होती होती है.

बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाले लोगों के मुताबिक कुछ जगहों पर लड़कियों को इसकी शुरुआत में बिना कपड़ों के रहना होता है और इस दौरान उनके शरीर पर केवल फूलों की माला और गहने होते हैं. कई दूसरी जगहों पर उत्सव के दौरान उन्हें शराब के पात्र लेकर जाना होता है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि इन लड़कियों को मंदिरों में पहले दुल्हन के रूप में तैयार किया जाता है और फिर, “उनके कपड़े हटा कर एक तरह से उन्हें नंगा कर दिया जाता है.” आयोग के मुताबिक यह एक तरह से देवदासी प्रथा है जिस पर भारत में पहले से ही प्रतिबंध है. आयोग ने सोमवार को इस बारे में रिपोर्ट जारी की है.

दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के साथ पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में देवदासी परंपरा चलती आ रही है. इसमें लड़कियों को धर्म के नाम पर सेक्स के लिए दान कर दिया जाता है. 1988 में इस परंपरा को गैरकानूनी घोषित कर प्रतिबंधित कर दिया गया.

आयोग की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, “इन लड़कियों को परिवार में रखने पर रोक लगा दी जाती है और उन्हें मठम्मा मंदिरों में रहने पर मजबूर किया जाता है. वे एक तरह से सार्वजनिक संपत्ति बन जाती हैं जहां उनका यौन शोषण होता है.” इस रिपोर्ट में तमिलनाडु में 15 दिन चलने वाले एक त्यौहार का जिक्र है जो इस मंगलवार को पूरा हुआ. इसमें स्थानीय देवियों की पूजा की जाती है. इसके लिए स्थानीय समुदाय सात छोटी बच्चियों को चुनता है जिन्हें पूजा के लिए मंदिर में रहना होता है.

राज्य सरकार ने लड़कियों से दुर्व्यवहार के आरोपों से इनकार किया है. मदुरै जिले के प्रशासनिक प्रमुख के वीरा राघव राव ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा है, “हमारी बाल रक्षा टीम ने मंदिर का दौरा किया था और बच्चियों की देखभाल के लिए उनके मां बाप भी वहां मंदिर में मौजूद थे.” राघव राव का यह भी कहना है, “ये 200 साल पुरानी परंपरा है और इलाके कई गांवों के मंदिरों में आज भी चली आ रही है. हमने किसी तरह का कोई दुर्व्यवहार नहीं देखा और हमारे अधिकारी इन कार्यक्रमों की निगरानी कर रहे थे. हमने बच्चियों को शॉल से ढंकने के लिए भी कहा.”

क्रिमिनोलॉजी की प्रोफेसर प्रियंवदा मोहन सिंह बताती हैं, “आप इलाके का दौरा करें तो देखेंगे कि नाम बदल जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि लड़कियों को रिवाज के नाम पर वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया जाता है.” प्रियंवदा ने 2016 में भारत सरकार के लिए देवदासी की परंपरा के बारे में सर्वेक्षण किया था. वे बताती हैं, “यह परंपरा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में चली आ रही है. हमने कई मामलों के बारे में अपने शोध में जिक्र किया है.” राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यह परंपरा बाल अधिकारों का हनन करती है. आयोग ने इस बारे में तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सरकारों से चार हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है.

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