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दमिश्क़ की मस्जिद ए ईमान में खुदकुश धमाका: 42 अफ़राद जांबाहक़

दमिश्क़, 23 मार्च: ( ए एफ पी ) दमिश्क़ की एक मरकज़ी मस्जिद में हुए एक खुदकुश बम हमला में कम अज़ कम 42 अफ़राद हलाक हो गए हैं जिन में शाम के सब से अहम मुवाफ़िक़ हुकूमत सुन्नी इमाम भी शामिल हैं।

दमिश्क़, 23 मार्च: ( ए एफ पी ) दमिश्क़ की एक मरकज़ी मस्जिद में हुए एक खुदकुश बम हमला में कम अज़ कम 42 अफ़राद हलाक हो गए हैं जिन में शाम के सब से अहम मुवाफ़िक़ हुकूमत सुन्नी इमाम भी शामिल हैं।

इसके इलावा इस हमला में दर्जनों अफ़राद ज़ख़्मी हुए हैं। वज़ारत-ए-सेहत के ओहदेदारों ने ये बात बताई । ये हमला कल ऐसे वक़्त में हुआ जबकि सारे मुल्क में मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर शदीद लड़ाई चल रही है और अक़वाम-ए-मुत्तहिदा के सेक्रेटरी जनरल बान की मून ने कहा कि अक़वाम-ए-मुत्तहिदा इस बात की तहकीकात करेगा कि आया इस लड़ाई में कीमीयाई हथियार तो इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं।

ओहदेदारों ने बताया कि एक खुदकुश बमबार ने ख़ुद को मस्जिद ए ईमान में पहूंच कर धमाका से उड़ा लिया जबकि इमाम शेख मुहम्मद सैयद अलबोती मज़हबी तलबा से ख़िताब कर रहे थे । इस हमला के बाद इराक़ में भी फ़िर्कावाराना तशद्दुद फूट पड़ा है । वज़ारत-ए-सेहत के ओहदेदारों का हवाला देते हुए सरकारी टी वी ने बताया कि इस हमला में जांबाहक़ होने वालों की तादाद 42 है जिसमें मस्जिद ए ईमान के इमाम भी शामिल हैं।

इसके इलावा 84 अफ़राद ज़ख़्मी भी हुए हैं। कहा गया है कि शेख मुहम्मद सैयद अलबूती शाम में सबसे सीनीयर सुन्नी रहनुमा थे । नमाज़ ए जुमा से क़ब्ल उनके ख़िताब को अक्सर-ओ-बेशतर सरकारी टी वी पर रास्त नशर ( Live Telecast) किया जाता था । कहा जा रहा है कि सदर बशर अल असद की हुकूमत के लिए उनकी मौत एक बड़ा नुक़्सान है जिसे अंदरून-ए-मुल्क बागियों से मुक़ाबला दरपेश है और मुल्क भर में खूंरेज़ लड़ाईयां जारी हैं।

दीगर अरब ममालिक की तरह शाम में भी मवाफिक़ जम्हूरियत नारे के साथ मुख़ालिफ़ हुकूमत मुज़ाहिरों का सिलसिला मार्च 2011 में शुरू हुआ था और बशर अल असद की हुकूमत इस सूरत-ए-हाल से मुसलसल दो साल से नबुर्दआज़मा है । इस तशद्दुद के नतीजा में सैंकड़ों अफ़राद हलाक हो चुके हैं और लाखों अफ़राद अपने घरों से फ़रार होकर पनाह गज़ीन की हैसियत से ज़िंदगियां गुज़ारने पर मजबूर हैं।

सरकारी टेलीवीज़न पर इस हमला के बाद मस्जिद के अंदर के इंतिहाई दिलख़राश मुनाज़िर दिखाए गए । मस्जिद के अंदर दर्जनों नाशें बिखरे हुए जिस्मानी आज़ा बिशमोल हाथ और पैर जा नमाज़ ( जायेनामज़) पर जाबजा फैले हुए थे और हर तरफ़ ख़ून के धब्बे दिखाई दे रहे थे ।

इमरजेंसी वर्कर्स ने इन तमाम बाक़ियात और नाशों को वहां से उठाया और उन्हें दवाखाने मुंतक़िल किया गया । इस दौरान अपोज़ीशन इत्तेहाद के सरबराह अहमद मुइज़ अलख़तीब ने इमाम शेख मुहम्मद सैयद अलबूती की हलाकत को एक संगीन जुर्म क़रार दिया है और इस शुबा का इज़हार किया है कि ख़ुद बशर अल असद की हुकूमत ने ये क़त्ल करवाया है ।

उन्होंने क़ाहिरा में फ़ोन पर ए एफ पी से बात चीत करते हुए कहा कि हम स्कालर डाक्टर मुहम्मद सैयद रमज़ान अलबूती के क़त्ल की शदीद मुज़म्मत करते हैं। 1929 में पैदा हुए मुहम्मद अलबूती एक बड़े कुर्द ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे और उन्होंने बरसों मज़हब इस्लाम की तालीम हासिल की ।

वो क़ाहिरा की जामिआ अज़हर में भी पढ़ चुके थे । वो हुकूमत के मुख़ालिफ़ीन पर तन्क़ीदें किया करते थे और अक्सर-ओ-बेशतर बागियों को निशाना बनाते हुए शाम के नौजवानों पर ज़ोर दिया करते थे कि वो फ़ौज में शामिल हो जाएं और उन मुख़ालिफ़ीन से मुक़ाबला करें।

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