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दलित मुद्दे पर मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा देना बीजेपी के लिए हो सकती परेशानी

लखनऊ। कहने को तो भाजपा के नेता कह रहे हैं कि मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा देने की जो नौटंकी की है उससे उनको (मायावती) कोई फायदा नहीं होने वाला है क्योंकि उनका दलित आधार अब भाजपा की तरफ खिसक आया है।

यदि उनको दलित अपना नेता मानता तो उप्र में 3 माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट तो जीती होती। बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इससे मायावती को अपनी हैसियत का पता चल जाना चाहिए था लेकिन लगता है कि उनको अब भी अपने बारे में भ्रम है।

जानकारी मुताबिक जो भी भाजपा नेता यह बात कह रहे हैं उनसे जब यह पूछा जा रहा है कि उप्र विधानसभा चुनाव में बसपा को लगभग 20 प्रतिशत वोट मिले हैं कि नहीं? उनका जवाब होता है, हां मिले तो हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि सपा को भी इससे थोड़े ही अधिक मिले हैं या नहीं? भाजपा नेताओं का जवाब होता है कि हां। कुछ प्रतिशत कांग्रेस को भी मिले हैं या नहीं? जवाब होता है, हां।

उनसे जब यह पूछा जाता है कि जिस तरह से भाजपा की केन्द्र सरकार चुन-चुन कर केवल कुछ विपक्षी नेताओं को ही भ्रष्टाचारी बता रही है, उनके यहां सी.बी.आई., आयकर, प्रवर्तन निदेशालय आदि के छापे डलवा रही है, उनकी सम्पत्ति सीज करवा रही है।

यदि विपक्षी दल आपस में गोलबंद होकर चुनाव लड़ें तब क्या होगा, यदि उप्र में सपा, बसपा और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा के विरुद्ध 2019 का चुनाव लड़ा तब तो तीनों को अलग-अलग मिले वोट प्रतिशत का योग बढ़ाकर भाजपा को मिले वोट प्रतिशत से 3 से 4 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा और भाजपा खलास हो जाएगी?

इस पर भाजपा नेताओं का जवाब होता है-न नव मन तेल होगा न ही राधा नाचेगी। ये मिलेंगे ही नहीं तो आपस में गठबंधन करके भाजपा के विरुद्ध चुनाव कैसे लड़ेंगे। इस तरह भाजपा नेताओं को लगता है कि विपक्षी दल आपसी गठबंधन ही नहीं कर पाएंगे।

हो सकता है कि भाजपा ने इनको अलग-अलग डरा रखा हो कि यदि आपने आपस में गठबंधन करने की कोशिश की तो आपकी हालत भी लालू व उनके कुनबे के यहां ‘मार छापा-मार छापा’ वाली कर दी जाएगी। फिर ऐसे में मायावती क्या करेंगी। मायावती का राज्यसभा में टर्म अप्रैल, 2018 में पूरा हो रहा है, यानी उनका राज्यसभा में कार्यकाल अभी 9 माह और है।

यदि उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया जाता है या नहीं मंजूर किए जाने पर भी वह अब राज्यसभा में नहीं जाती हैं तो क्या करेंगी? तब वह उप्र में दलितों पर हो रहे हमलों, मुसलमानों को मारे जाने आदि को मुद्दा बनाकर धरना-प्रदर्शन करवाएंगी और इलाहाबाद के पास फुलपुर संसदीय सीट से लोकसभा का उपचुनाव लड़ सकती हैं जिसको उपमुख्यमंत्री बन जाने के बाद केशव प्रसाद मौर्य अगस्त, 2017 में खाली करेंगे। यानी भाजपा सांसद पद से इस्तीफा देंगे तो वहां उपचुनाव होगा।

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