Friday , October 20 2017
Home / India / दानिश्वरों ने अल्लामा इक़बाल के क़ौमी फ़लसफे को समझने में ग़लती की

दानिश्वरों ने अल्लामा इक़बाल के क़ौमी फ़लसफे को समझने में ग़लती की

आलमी शौहरत याफ़ता शायर-ओ-मुफ़क्किर अल्लामा इक़बाल ना सिर्फ़ दूर अंदेश अदीब-ओ-नाक़िद थे बल्कि इंसानी हुक़ूक़ के लिए जद्द-ओ-जहद करने वाले अज़ीम इंसान भी थे। उन्होंने मज़हब इस्लाम के सहीह मफ़हूम को अपनी शायरी के ज़रीया पेश करने और मुस्लमानों

आलमी शौहरत याफ़ता शायर-ओ-मुफ़क्किर अल्लामा इक़बाल ना सिर्फ़ दूर अंदेश अदीब-ओ-नाक़िद थे बल्कि इंसानी हुक़ूक़ के लिए जद्द-ओ-जहद करने वाले अज़ीम इंसान भी थे। उन्होंने मज़हब इस्लाम के सहीह मफ़हूम को अपनी शायरी के ज़रीया पेश करने और मुस्लमानों की सफ़ों में इत्तिहाद और इन में बेदारी पैदा करने के लिए उम्र भर मुजाहिदाना ख़िदमात अंजाम दें।

जामिआ उर्दू अलीगढ़ के ओहदेदार बराए ख़ुसूसी फ़राइज़ जनाब फ़र्हत अली ख़ान यौमे इक़बाल के मौक़ा पर मुनाक़िदा तक़रीब को बतौर मेहमान ख़ुसूसी ख़िताब कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अल्लामा इक़बाल की फ़िक्र-ओ‍फ़लसफे को समझने में दानिश्वरों ने ग़लती की है और उन के साथ इंसाफ़ नहीं किया।

तक़रीब में डाइरेक्टर जसीम मुहम्मद ने कहा कि मुल्क का एक दानिश्वर तबक़ा अल्लामा इक़बाल को पाकिस्तान के क़ियाम का तसव्वुर पेश करने वाले शायर समझता है, हालाँकि ये दुरुस्त नहीं है। उन्होंने उसे दानिश्वरों को चैलेंज किया कि वो अल्लामा इक़बाल की शायरी यह ख़िताब से एसी कोई मिसाल पेश कर दिखाएं जिस में उन्होंने तक़सीम हिंद की हिमायत की हो।

उन्होंने कहा कि अल्लामा इक़बाल मुहिब-ए-वतन थे और उर्दू ज़बान की आलमी सतह पर शनाख़्त पैदा करने में उन्होंने कलीदी किरदार अदा किया। रजिस्ट्रार जामिआ उर्दू मुहतरमा सुमन रज़ा नक़वी ने कहा कि बर्तानवी दौर में बर्र-ए-सग़ीर के सियासी-ओ-समाजी हालात अबतर थे।

ख़ुसूसन मुस्लमान वहम-ओ-तुहमात की पस्ती में मुबतला थे। उसे नाज़ुक दौर में शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल ने फ़लसफ़ा ख़ुदी के ज़रीये मुस्लमानों को ना सिर्फ़ बेदार किया बल्कि उन्हें दूर-ए-हाज़िर में अपना मुक़ाम क़ायम करने, कामयाबी-ओ-कामरानी के नए आसमान तलाश करने की तलक़ीन भी की।

जामिआ उर्दू अलीगढ़ के कंट्रोलर रिज़वान अली ख़ां ने कहा कि इस बात को तस्लीम करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि अल्लामा इक़बाल बुनियादी तौर पर एक अज़ीम हिन्दुस्तानी थे। जामिआ उर्दू मुशावरती काउंसल के सदर प्रोफेसर रज़ा उल्लाह ख़ां ने कहा कि अल्लामा इक़बाल ने बर्र-ए-सग़ीर में फ़िक्र-ओ-फ़लसफ़ा की नई तारीख रक़म की थी।

डिप्टी रजिस्ट्रार क़दीर मलिक‌ ने भी अल्लामा इक़बाल की शख्सियत पर अपने ख़्यालात का इज़हार किया। तक़रीब में इत्तिफ़ाक़ राय से मंज़ूर की गई क़रारदाद में अल्लामा इक़बाल के यौमे पैदाइश को क़ौमी तक़रीब के तौर पर मनाए जाने का हकूमत-ए-हिन्द से मुतालिबा किया गया।

TOPPOPULARRECENT