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दिल्ली शहर की सद साला तकमील पर मुखतलिफ् तक़रीब

नई दिल्ली १३ दिसम्बर (पी टी आई) नई दिल्ली जिसे क़दीम ज़माने में अंदर परस्त के नाम से जाना जाता था और कई राजा महाराजाओं की हुकूमतों का दार-उल-ख़लाफ़ा रहा। इन्द्र परस्त् के बाद उसका नाम नई दिल्ली रखा गया जहां मुग़ल बादशाहों ने भी सैंकड़ों

नई दिल्ली १३ दिसम्बर (पी टी आई) नई दिल्ली जिसे क़दीम ज़माने में अंदर परस्त के नाम से जाना जाता था और कई राजा महाराजाओं की हुकूमतों का दार-उल-ख़लाफ़ा रहा। इन्द्र परस्त् के बाद उसका नाम नई दिल्ली रखा गया जहां मुग़ल बादशाहों ने भी सैंकड़ों साल हुकूमत की और अब इस शहर ने एक नया संग-ए-मेल पार किया है और वो ये है कि असरी ज़माने में दार-उल-ख़लाफ़ा होने का शरफ़ हासिल करते हुए इस ने 100 साल मुकम्मल कर लिए हैं।

यहां इस बात का तज़किरा ज़रूरी है कि दिल्ली को बर्तानवी सामराज का दार-उल-ख़लाफ़ा 12 डसमबर 1911 -ए-को बनाया गया था जो दरअसल कोलकता से मुंतक़िल होकर दिल्ली लाया गया था। इस वक़्त के शहनशाह हिंद जॉर्ज पनजसम ने दिल्ली को दार-उल-ख़लाफ़ा बनाकर दरअसल शहर की अज़मत रफ़्ता को बहाल किया था। अब जबकि एक सदी मुकम्मल होचुकी है लिहाज़ा हुकूमत दिल्ली और दीगर सक़ाफ़्ती रंजिशों जैसे इंडियन कौंसल फ़ार कल्चरल रयानतनीज़ ने मुख़्तलिफ़ तक़रीबात की तैयारीयां कर रखी हैं।

आग़ाज़ के तौर पर वज़ीर-ए-आला शीला दीक्षित एक किताब की रस्म इजराई अंजाम देंगी। मज़कूरा किताब सात शहरों की कहानी पर मुश्तमिल है जिन में दिल्ली भी शामिल है। जिस के ज़रीया दिल्ली शहर किस तरह आबाद हुआ उस की क्या सक़ाफ़्त और ज़बान कैसी थी और यहां त्योहारों को मौसम क्या होता था। इन तमाम तफ़सीलात मज़कूरा किताब में मौजूद हैं। इलावा अज़ीं इस मौक़ा पर ख़ुसूसी साव नय्यर भी जारी किए जाएंगी। हैदराबाद की तर्ज़ पर एक बड़ी और शानदार नुमाइश का भी एहतिमाम किया जाएगा जहां दिल्ली की तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को पेश किया जाएगा।

तक़रीबात में एक फ़ोटो नुमाइश भी शामिल है जहां दिल्ली की तारीख़ी इमारतों की तसावीर को नुमाइश में रखा जाएगा। वज़ीर-ए-आला शीला दीक्षित और गवर्नर तजिन्द्र खन्ना के हाथों दास्तान दिल्ली नामी एक नुमाइश का इफ़्तिताह भी अमल में आएगा जहां ज़माना-ए-क़दीम से लेकर असरी ज़माने तक दिल्ली की बदलती हुई तहज़ीब की झलक पेश की जाएगी। दिल्ली की क़दीम और तारीख़ी इमारतों के साथ साथ जदीद तर्ज़ की इमारतों का एक साथ शाना बशाना मौजूद होना भी एक शाज़-ओ-नादिर रौनुमा होने वाला वाक़िया है।

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