Friday , October 20 2017
Home / World / दुनिया की निस्फ़ ज़बानें मादूमी के ख़तरे से दो-चार

दुनिया की निस्फ़ ज़बानें मादूमी के ख़तरे से दो-चार

एक मुहतात अंदाज़े के मुताबिक़ दुनिया में इस वक़्त छः हज़ार से ज़ाइद ज़बानें बोली जाती हैं जिन में से लग भग तीन हज़ार इस सदी के इख़तताम तक सफ़ा हस्ती से मिट जाएंगी।माहिरीन-ए-लिसानियात(विशेषज्ञों भाषाविज्ञान/Experts Linguistics) के मुताबिक़ सिर्फ बर्र-ए-आज़म हाय शुमाली-ओ-जुनूबी(उत्तर और‌ दक्षिण) अमेरीका की 800 में से 500 क़दीम बोलियां और ज़बानें या तो फ़ना होचुकी हैं या मादुमीयत के ख़तरे से दो-चार हैं।

इन ज़बानों में से अक्सर के बोलने और लिखने वाले महिज़ चंद ही लोग दुनिया में बाक़ी बचे हैं। अगर इन ज़बानों को महफ़ूज़ रखने और नौजवान नसल तक मुंतक़िल करने की महिकमा जाती और मुनज़्ज़म कोशिशें ना की गईं तो ये जल्द ही माज़ी का क़िस्सा बन जाएंगी।माहिरीन-ए-लिसानियात के मुताबिक़ मादूम होजाने वाली या मादुमीयत के दहाने पर खड़ी ज़बानों की भी दो इक़साम हैं।

पहली किस्म की मिसाल लैतीनी ज़बान है जिसे इस लिए मुर्दा क़रार दिया जाता है क्यों कि इस का इर्तिक़ाई अमल रुक चुका है और तालीमी इदारों और गिरजाघरों से बाहर इस ज़बान का कोई वजूद नहीं।अब भी लाखों लोग लैतीनी ज़बान बिलवासता तौर पर पढ़ते हैं क्यों कि तिब्ब और क़ानून की कई इस्तिलाहें लैतीनी हैं जब कि हिसपानवी, पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, रुमानवी और अंग्रेज़ी जैसी मारूफ़ और मुस्तामल ज़बानों ने भी लैतीनी से कई अलफ़ाज़ मुस्तआर ले रखे हैं।

लेकिन इस ज़बान में आम बोल चाल अब तर्क होचुकी है।मादूम ज़बानों की दूसरी खिसम में वो ज़बानें आती हैं जो सफ़ा हस्ती से मुकम्मल तौर पर मिट चुकी हैं ओरिजिन का बोलने वाला अब दुनिया में एक भी शख़्स मौजूद नहीं रहा।बर्र-ए-आज़म अमेरीका की सैंकड़ों क़दीम ज़बानें इसी हाल से दो-चार होचुकी हैं कि अब उन के बोलने और लिखने वाला कोई शख़्स दस्तयाब नहीं।

जो क़बाइल ये ज़बानें बोलते थे, वो या तो ख़ुद इमतिदाद-ए-ज़माना की नज़र होकर अपना वजूद खो बैठे या उन्हों ने ख़ित्ते के बदलते हुए सयासी हालात के पेश-ए-नज़र ग़ालिब ज़बानों अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी को इख़तियार करलिया।रफ़्ता रफ़्ता उन क़बाइल के बुज़ुर्गों ने भी नई नसल के साथ अपनी क़दीम ज़बान में गुफ़्तगु तर्क करदी और यूं उन के साथ साथ ये ज़बानें भी अपना वजूद खो बैठें।लेकिन ऐसी कई मादूम ज़बानों के अहया की संजीदा कोशिशें मुसलसल जारी हैं और उन कोशिशों के पीछे तहक़ीक़ी मिज़ाज की तसकीन ही नहीं बल्कि अज़मत-ए-रफ़्ता की बहाली का जज़बा भी कारफ़रमा रहा है।

TOPPOPULARRECENT