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देखें: ओवेसी के “भारत माता की जय” वाले बयान पर जावेद अख्तर का हमला

नई दिल्ली : राज्यसभा में सांसद जावेद अख़्तर ने मंगलवार को अपने विदाई भाषण में एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम लिए बगैर उन पर हमला बोला.साथ ही उन्होंने दक्षिणपंथी अतिवादियों की भी निंदा की.उन्होंने कहा आए दिन कुछ ऐसी बात सुनने को आती हैं, जो न सुनते तो अच्छा था. अभी दो-तीन दिन पहले एक (ओवेसी )साहब आए हैं जिन्हें ये ख्याल हो गया है कि वे नेशनल लीडर हैं. हालांकि हक़ीक़त है कि हिंदुस्तान के एक राज्य आंध्र प्रदेश के एक शहर हैदराबाद के एक मोहल्ले के नेता हैं. उन्होंने यह कहा कि वे ‘भारत माता की जय’ नहीं कहना चाहते. इसलिए कि संविधान उन्हें नहीं कहता. संविधान तो उन्हें शेरवानी पहनने को भी नहीं कहता, टोपी लगाने को भी नहीं कहता.

मैं यह जानने में दिलचस्पी नहीं रखता कि ‘भारत माता की जय’ कहना मेरा कर्तव्य है या नहीं. यह मैं जानना भी नहीं चाहता. इसलिए कि यह मेरा कर्तव्य नहीं, मेरा अधिकार है. मैं कहता हूँ ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’. ये कौन लोग हैं. मैं इस बात को और उनके इस ख़्याल को जितने सख़्त लफ़्ज़ों में मुमकिन है, जो बुरे न हों, निंदा करता हूँ. और मैं इतनी ही सख़्ती से एक और नारे की भी निंदा करता हूँ- मुसलमान के दो स्थान, क़ब्रिस्तान या पाकिस्तान.

उनका कहना था कि भारत एक दोराहे पर है जहां उसे फ़ैसला करना है कि उसे धर्म-मज़हब की बुनियाद पर मुल्क की नींव खड़ी करनी है या धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर.

अच्छा वक़्त-बुरा वक़्त कैसा भी हो गुज़र जाता है. ये छह साल भी गुज़र गए और ऐसे गुज़रे कि लगा मैंने छह बार आंखें झपकाई हैं लेकिन इस तेज़ी में भी जो मुझे देखने को मिला, वह मैं अपने दिल में संभालकर रखूँगा. मैंने प्रतिपक्ष के नेता और फिर सदन के नेता अरुण जेटली, कपिल सिब्बल, वृंदा करात, रविशंकर प्रसाद, रामगोपाल यादव को सुना…मशहूर शायद मजाज़ पहली बार एक मुशायरे में कश्मीर गए. किसी ने पूछा कि कैसा लगा कश्मीर. तो उनका कहना था – बीच में पहाड़ आ गए, वरना और भी देख सकता था. तो यहां कुछ स्थगन आ गए थे, वरना और भी तक़रीरें सुन लेता, लेकिन जितना सुना वह भी काफ़ी है.

यहां जब मैं आया तो खास मक़सद लेकर आया था. कुछ लेखकों और कंपोज़रों की समस्याएं थीं. मैं सोनिया गांधी से मिला जिन्होंने मुझे मनमोहन सिंह से मिलवाया. उनका कहना था कि विपक्ष से, भाजपा से बात कर लीजिए. मैं अरुण जेटली से मिला, जिन्हें पहले से इस समस्या का पता था. मुझे लगा कि काम हो जाएगा. मुझे मनमोहन सिंह की बात अच्छी लगी कि विपक्ष से बात कर लीजिए.

शायद मेरे कुछ दोस्त मुझसे नाराज़ होंगे, लेकिन यह मैं दिल से समझता हूँ कि इस सरकार में बड़े क़ाबिल लोग भी हैं, जो बहुत अच्छा काम करते हैं और कर सकते हैं. उनके ऊपर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि यह कथित फ्रिंज जो न सिर्फ़ मामूली नेता हैं, विधायक, सांसद और राज्य मंत्री भी हैं और कभी-कभी मंत्री भी हैं, उन्हें क़ाबू में लें. मैं यही उम्मीद करूंगा कि विपक्ष की भी भूमिका है. इसलिए कि जो नौजवान हैं वो हमेशा नौजवान नहीं रहेंगे. जापान ये फ़ायदा खो चुका है, चीन इसे खो रहा है. आपके पास ज़्यादा से ज़्यादा 20 साल हैं. जब आपके पास ऊर्जा है. फिर आप एक पठार पर पहुँच जाएंगे, जहां कुछ देर रहेंगे. सौ-डेढ़ सौ साल बाद फिर ये हालात आएंगे.

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