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देश की आज़ादी झूठी नहीं लेकिन अधूरी ज़रूर है

एक और साल हमारी जश्न ए आज़ादी का आज पूरा हुआ. पूरे देश वासियों को जश्न ए आज़ादी की बधाई. आज 70 साल हो गए हमें देश को आज़ाद कराये. अपने देश को अपना घर बनाये. आज पूरा देश खुशियां मना रहा है क्योंकि अब हम ग़ुलाम नही रहे. इसी 70 साल की आज़ादी में एक और साल जुड़ गया दलितों पे अत्याचार का, आदिवासियों के जल जंगल ज़मीन छीनने की कोशिश का, महिलाओं के सम्मान के चीरहरण का, अल्पसंख्याकों पर अन्याय का, खत्म होते मानवता का. इसी देश के एक राज्य गुजरात के ऊना में आज दलित पर हो रहे अत्याचार की मुक्ति के लिए वहां के लोग मार्च कर रहे हैं. वो आज भी अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं. जिस देश का संविधान अपने हर नागरिक को समान अधिकार देता है उसी देश में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्याकों और महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है. गऊ रक्षा के नाम पर पहले मुसलमानों को निसाना बनाया गया और अब दलितों को बनाया जा रहा है. क्योंकि इंसानो की रक्षा से ज्यादा जानवरों की रक्षा जरुरी हैं. निसंदेह जानवरों की रक्षा भी जरुरी है क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है यहां खेती के लिए जानवरों का सहारा लिया जाता है इसलिए उन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी है लेकिन किसी इंसान के जान की कीमत पर बिलकुल नही. लंबे समय से चुप्पी साधे हमारे प्रधानमंत्री ने गोऊ रक्षकों पर सवाल उठाया, आखिर उन्हें बड़े पैमाने पर दलितों ने भी तो वोट दिया है और अब उनके ही गुजरात मोडल फ़ैल होता हुआ नजर आ रहा है तो चुप्पी तोडना तो लाजिमी था. देश का एक हिस्सा कश्मीर जहां पिछले 38 दिनों से कर्फ्यू लगा हुआ है. एक तरफ देश की आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा है दूसरी तरफ कश्मीर की घाटियों में रहने वाले लोगों को खुली हवा में साँस तक लेने की आज़ादी नही. क्योंकि वहां के लोग कभी जिहादियों तो कभी तथाकथित सुरक्षाबलों के हाथों कैद हैं. क्योंकि कश्मीर हमारे अखंड भारत का हिस्सा है और रहेगा. लेकिन सिर्फ कश्मीर हमारा रहेगा वहां के लोग नही. हमारी अखंडता में हमारे देश की ज़मीन बड़ी होनी चाहये तभी तो हम कश्मीर से प्यार करते हैं कश्मीरियों से नही. कश्मीर का मामला हर दिन उलझता जा रहा है ताकि कश्मीर के नाम पर राजनीति कभी कम न हो. आखिर कब तक कश्मीर के लोग कभी तथाकथित सुरक्षाबलों तो कभी जिहादियों, अलगाववादियों के हाथों बंधक बने रहेंगे. हमारी सरकार को वोट की राजनीति छोड़ कर वहां के लोगों को भी जश्न ए आज़ादी में शामिल करना होगा तभी हमारी आज़ादी की जश्न पूरी हो पायेगी. आज़ादी के दो दिन पहले शनिवार रात को जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्रावास पर दिल्ली पुलिस की छापेमारी क्या साबित करती हैं. छात्रों के हंगामा करने पर ये दलील दी जाती है की 15 अगस्त को ध्यान में रखते हुए रूटीन चेक किया गया हैं. सवाल ये उठता हैं की ये रूटीन छापेमारी इससे पहले तो कभी नही की गयी और आज जामिया मिलिया ही क्यों. छापेमारी करने की एक मजबूत वजह माइनॉरिटी रहा हैं. क्या ये लोकतंत्र पर हमला नही हैं. क्योंकि जामिया मिल्लिया में मुस्लिम छात्रों की संख्या ज्यादा हैं इसलिए वो छापामारी जायज थी. धीरे-धीरे लोकतंत्र को कमजोर कर हम कौन सा मज़बूत राष्ट्र की कल्पना कर रहे हैं.हर दिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचार बढ़ ही रहे हैं. देश की आधी आबादी आज़ादी से कोसों की दूरी पर है लेकिन हमारा देश आज़ाद है. देश की आज़ादी की लड़ाइयों में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. आज़ादी से ले कर आज तक महिलाएं भारत का नाम रौशन करती आयीं हैं.543 लोक सभा सीटों में 61 महिलाएं हैं. आप समझ सकते हैं संसद में कितने प्रतिसत महिलाएं हैं.33% की मांग जो सालों से महिलाओं की तरफ से किया जा रहा है जो 2010 में राज्य सभा में पास होने के बाद भी आज तक लोक सभा में पड़ा हुआ है. बीजेपी की सरकार जो महिलाओं की सबसे हितेषी सरकार कहती है खुद को, आज लोक सभा में बहुमत में होते हुए भी क्यों ये मांग पूरी नही कर पा रही है. राजनीति से महिलाएं दूर रहे इसकी कोशिश हर पार्टी करती हुई नजर आती है. आज जिस तरह हर पार्टी के नेता अपना शिकार महिलाओं को बना रहे हैं वो इस बात की ओर ही इशारा करता है की महिलाओं को राजनीति से दूर रहना चाहये. घर से ले कर बाहर तक कहीं भी आज महिलाएं सुरक्षित नही हैं. इसके बावजूद हमें हर दिन भारत माता की जय कहना चाहये क्योंकि भारत की महिलाएं भारत माता से अलग हैं. भारत की महिलाएं भारत माता की मूर्ति जैसे चुप नही हैं वो उन्मुक्त हो कर खुले आसमान में उड़ना चाहती हैं, जबकि हमारी भारत माता खूबसूरत लाल साडी में गहनों के साथ चुप खरी हैं. उसे उन्मुक्ता की जरुरत नही, बगैर सवाल किये दूसरे के हाथों से रोज सजती हैं इसलिए हमें उस भारत माता की जय कहना चाहिए आधुनिक समाज की असभ्य आज़ाद महिलाएं तो सिर्फ पूंजीवादी वर्ग की नुमाइश हैं जिसे हर दिन बेच कर कुछ ख़रीदा जाये. आज जब हर तरफ बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा फैला हुआ है. जिसे खत्म करने की कोशिश नही बल्कि बनाये रख कर राजनीति ही सिर्फ की जा रही हो तब हमें सिर्फ लाल किले से दो घंटे भाषण देने की नही बल्कि गंभीर हो कर एकजुटता के साथ समाधान करने की जरूरत हैं. में किसी अति क्रांतिकारियों की तरह देश की आज़ादी को झूटी नही मानती लेकिन हाँ अधूरी जरूर मानती हूँ. ये अधूरापन सरकार और समाज की एकता से ही पूरी हो सकती है.

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राहिला परवीन
लेखिका -जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर है

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