Tuesday , September 26 2017
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देश की सड़कों पर घूम रहे हैं 75000 से भी ज़्यादा पढ़े लिखे भिखारी।

उनके कपड़े, चेहरे के हाव-भाव, मदद के लिए फैले हाथ शायद आपको अपनी जेबें टटोलने पर मजबूर कर देते हों लेकिन जनाब ज़रा आंकड़ों पर नज़र डालिये तो आपके दिलों में इनके लिए जाएगी हमदर्दी कुछ पल के लिए ही सही लेकिन गायब जरूर हो जाएगी।

बिलकुल यही हुआ उन लोगों के साथ जिन्होंने 2011 में किये एक सर्वे रिपोर्ट को पढ़ा। दरअसल ‘ Non-Workers by Main Activity and Education Level’ नाम की इस हफ्ते रिलीज़ हुई इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है की देश की सड़कों पर घूम रहे करीबन 3.72 लाख भिखारियों में से करीब 21% यानि 75000 भिखारी 12 वीं पास हैं। इसके इलावा कुछ महारथी तो ऐसे भी हैं जिन्होंने बी-टेक, एमबीए या कोई और प्रोफेशनल कोर्स भी कर रखा है।

ऐसा नहीं है कि देश के इन लोगों के पास नौकरियां है नहीं या पहले नहीं थीं। इन लोगों ने खुद यह पेश चुना है ताकि यह मुफ्त के पैसे पर ऐश कर सकें और जबकि ट्रैफिक सिग्नल पर रुकने वाले लोगों में से बहुत से लोग लाल बत्ती पर यही सोच रहे होते हैं की महीने का खर्च कैसे कम किया जाए। रिपोर्ट में तो यहाँ तक भी लिखा है कि कुछ पढ़े लिखे भिखारियों के पास तो नौकरी भी है लेकिन फिर भी मुफ्त के पैसे की लत ऐसी लगी हुई है की वो भीख मांगने को साइड बिज़नेस की तरह मानकर चलते हैं। ऐसे ही एक भिखारी या यूँ कहें कि बिज़नेस मैन की बात करें तो 12वीं पास दिनेश कोढाभाई जो अहमदाबाद के भद्रकाली मंदिर के बाहर बैठ अपना भीख का धंधा चलाते हैं ने फर्राटेदार अंग्रेजी में बोलते हुए सर्वे टीम से कहा “I may be poor but I am an honest man. I beg as it fetches me more money, Rs 200 a day. My last job of a ward boy in a hospital got me only Rs 100 a day” इतनी फर्राटेदार इंग्लिश अगर वो किसी कंपनी की इंटरव्यू में बोलता तो शायद उसे भीख मांगने की कभी जरुरत ही न पड़ती।

ऐसी ही एक उदाहरण है दशरथ परमार की जो करीबन (52) साल के हैं। दशरथ के पास एम-कॉम की डिग्री है जो उसने गुजरात यूनिवर्सिटी से हासिल की है लेकिन सरकारी नौकरी न मिलने और प्राइवेट कंपनी में दिल न लगने की वजह से दशरथ ने भीख मांगे का रास्ता चुना।

भिखारियों के लिए काम करती एक संस्था ‘ मानव साधना’ के बिरेन जोशी ने अपने इंटरव्यू में कहा: ” इन भिखारियों को दुसरे कामों में लगाना बहुत मुश्किल काम है क्यूंकि मुफ्त के पैसे की आदत इन्हें फिर से इसी काम में खींच लाती है”
आखिर में हम कह सकते हैं अगर भीख मांगने की इस बीमारी को देश से खत्म करना है तो भीख मांगने को सरकार या क़ानून की तरफ से जुर्म करार दिया जाना चाहिए जिससे न सिर्फ लोगों की ज़िन्दगी बदलेगी बल्कि देश की छवि भी बदलेगी।

 

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