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देश के लिए हंसते हंसते सूली पर चढ़ जाने वाले ‘शेख भिखारी’ को इतिहास ने भुला दिया

रांची: देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के आंदोलन में एक नाम शेख भिखारी का भी है। झारखंड के शेख भिखारी 9 जनवरी 1857 को अपने साथी टिकैत उमराव सिंह के साथ फांसी दे दी गई थी। लेकिन देश की खातिर जान न्यौछावर कर देने वाले इस स्वतंत्रता सेनानी को इतिहास ने भुला दिया है।

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देश की आजादी के लिए होने वाली आंदोलन में शहादत पाने वालों में शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह का नाम शामिल है।इन दोनों धुरंधरों को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार करके आज ही के दिन सन् 1858 में रांची के पास चटोपालो घाटी में पेड़ पर लटकाकर मार डाला था।

हर साल कुछ सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के लोग यहां पहुंच कर उन्हें श्रधांजली अर्पित करते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर उन्हें याद नहीं किया जाता है।शहीद शेख भिखारी रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर खद्या नामक गांव के रहने वाले थे। यह क़स्बा शहीद शेख भिखारी के वारिसों का है। इसके बावजूद यह कस्बा और उनके वारिस आज भी पिछड़ेपन के शिकार हैं।

शहीद दिवस के अवसर पर इस कस्बे और रांची में विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा छोटे छोटे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि शहीद शेख भिखारी के नाम पर राज्य में ऐसी यादगार स्थापित की जाएगी, जिससे नई पीढ़ी लाभ उठा सके और देश की खातिर उनके दिए कुरबानी को याद रखा जा सके।

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