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देश में समान सामाजिक प्रणाली की स्थापना की कोशिश ना की जाए:राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

गांधीनगर 24 अक्टूबर: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारत को अपने बहुलवादी और बहुसांस्कृतिक समाज प्रणाली का जश्न मनाना चाहिए और उसे एक ही सभ्यता पर आधारित एकमात्र चिकित्सा समाज में बदलने की कृत्रिम प्रयास नहीं होनी चाहिए।

यह स्पष्ट करते हुए कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से विकास कर रही है प्रणब मुखर्जी ने कहा कि यह कोई दुर्घटना या एक या दो साल की सफलता नहीं है। राष्ट्रपति ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता शंकर सनाह वाघेला की ओर से चलाए जाने वाले कॉलेज में एक समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम 1.25 अरब लोग हैं। हमारे देश में दैनिक जीवन में 200 भाषाएँ उपयोग किया जाता है। हमारे देश में सात धर्मों और तीन बड़े जातीय समूह हैं। उन्होंने कहा कि यह सब हमारी सांस्कृतिक उदारता का परिणाम है यह सब कुछ हमारे जुनून का नतीजा है और हमें अपने बहुलवादी प्रणाली का जश्न मनाना चाहिए। हमें इस विविधता को खत्म करने और समानता वाले समाज का गठन किया कृत्रिम कोशिशें नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यही हमारे प्राचीन संतों ‘दार्शनिकों और नेताओं की शिक्षाओं हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के बिल्डरों से कई सवाल किए गए थे। कहा गया है कि यह एक गरीब ‘अनपढ़’ बीमारियों वाला देश है और यहाँ कैसे समकालीन संसदीय संवैधानिक तंत्र स्थापित किया जा सकता है।

हालांकि दो आम चुनावों के सफल आयोजन के बाद उन्हें लोगों ने कहा था कि भारतीय संविधान अत्यंत महत्वपूर्ण ‘अच्छा है और उसके द्वारा सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाया जा सकता है। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत सामाजिक-आर्थिक बदलाव की राह पर संविधान की वजह से चल सका है। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रहा है और यह कोई संयोग या दुर्घटना नहीं है और ना ही यह एक दो साल की कोशिश का परिणाम है। यह एक बे तकान और लगातार संघर्ष का परिणाम है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में युवाओं को रोजगार प्राप्त करने की क्षमता का प्रदान करना बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा इसके नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं।

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