Wednesday , October 18 2017
Home / Hyderabad News / दो सौ रुपये वज़ीफ़े के लिए चार दिन से परेशान

दो सौ रुपये वज़ीफ़े के लिए चार दिन से परेशान

सारे मुल्क में महंगाई में मुसलसल इज़ाफ़ा होता जा रहा है, गरीब आदमी के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतेज़ाम भी मुश्किल हो गया है। जब कि मुतवस्सित तबक़ा भी एक ख़तरनाक वबा की तरह फैलती महंगाई से शदीद मुतास्सिर हो रहा है। ताहम अपनी इज़्ज़त के बाइ

सारे मुल्क में महंगाई में मुसलसल इज़ाफ़ा होता जा रहा है, गरीब आदमी के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतेज़ाम भी मुश्किल हो गया है। जब कि मुतवस्सित तबक़ा भी एक ख़तरनाक वबा की तरह फैलती महंगाई से शदीद मुतास्सिर हो रहा है। ताहम अपनी इज़्ज़त के बाइस वो दूसरों के आगे हाथ फैलाने से गुरेज़ करता है।

जहां तक महंगाई का सवाल है एक औसत किस्म का चावल 35-40 रुपये फ़ी किलो हो गया है। एक प्याली चाय 10 रुपये तक पहुंच गई। बर्क़ी और आबरसानी के बिलों में मुसलसल इज़ाफ़ा ही होता जा रहा है। ऐसे में अगर हुकूमत गरीब कमज़ोर बेबस और बेसहारा ज़ईफ़ मर्द और ख्वातीन की अलमनाक ज़िंदगी गुज़ारने वाली बेवा और जिस्मानी और ज़हनी माज़ूरी का शिकार अफ़राद को सिर्फ़ दो सौ रुपये माहाना वज़ीफ़ा फ़राहम करती है तो उसे हम किसी भी तरह अवाम पर एहसान नहीं कहेंगे बल्कि ऐसे गरीब और मजबूर अवाम के साथ हुकूमत का ज़ालिमाना मज़ाक़ क़रार देंगे।

पुराना शहर के दो मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर आज राक़िमुल हुरूफ़ ने देखा कि इंतिहाई कमज़ोर और ज़ईफ़ ख़्वातीन, बेवाएं और माज़ूरीन का जम्मे ग़फ़ीर है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ 200 रुपये की मामूली रक़म बतौर माहाना वज़ीफ़ा हासिल करने के लिए जमा हुए थे लेकिन इंदिरा गांधी नेशनल ओल्ड एज पेंशन स्कीम के तहत दी जाने वाली रक़म ना मिलने पर उन गरीबों की आँखों से आँसू रवां थे।

हम ने ऐसे ज़ईफ़ मर्द और ख़्वातीन को भी देखा जो शूगर और दीगर अमराज़ कुहना में मुबतला थे वो कम्यूनिटी हॉल्स में ही पेशाब कर रहे थे। वो पेशाब को रोकना चाहते हुए भी नहीं रोक पा रहे थे। ये सब कुछ सिर्फ़ दो सौ रुपये की मामूली सी रक़म के लिए हो रहा था। आम तौर पर ये वज़ीफ़ा ज़ईफ़ मर्द और ख़्वातीन बेवा और माज़ूरीन में हर माह की एक ता 5 तारीख तक तक़सीम किया जाता है।

और इस के लिए हुकूमत ने इन गरीबों को आई सी आई सी आई बैंक के स्मार्ट कार्ड्स दीए हैं और उन कम्यूनिटी हॉल्स में आई सी आई सी आई के पंचिंग मशीनों के ज़रीए वज़ीफ़ा की रक़म फ़राहम की जाती है लेकिन ये मशीनें गुज़िश्ता चार यौम से काम नहीं कर रही हैं।

बहरहाल कलेक्टर हैदराबाद को चाहीए कि वो इस मसअले पर ख़ुसूसी तवज्जा दें वर्ना ये गरीब मर्द और ख़्वातीन और माज़ूरीन वज़ीफ़े हासिल करने कम्यूनिटी हॉल्स पर नहीं बल्कि दफ़्तर कलेक्टर पर पहुंच जाएंगे।

TOPPOPULARRECENT