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नफरत की खेती में उगाए जा रहे फसादात

मुल्क को फ़सादात से पाक रखने और अमन-ओ-अमान की बक़ा के लिए मौक़ा परस्ताना सियासत को मुस्तरद करना चाहिए और एक ऐसे सियासी निज़ाम को फ़रोग़ देना चाहिए जो फ़िर्क़ावाराना ख़ुतूत पर राय दहिन्दों का एतिमाद हासिल करने से गुरेज़ करे।

मुल्क को फ़सादात से पाक रखने और अमन-ओ-अमान की बक़ा के लिए मौक़ा परस्ताना सियासत को मुस्तरद करना चाहिए और एक ऐसे सियासी निज़ाम को फ़रोग़ देना चाहिए जो फ़िर्क़ावाराना ख़ुतूत पर राय दहिन्दों का एतिमाद हासिल करने से गुरेज़ करे।
मुल्क का दस्तूर तमाम शहरियों को मुसावात का तयक़ुन देता है मगर हम देख रहे हैं कि दस्तूर में जो वादे किए गए हैं वो टूटते बिखर रहे हैं जिस से मुल्क की सालमीयत को ख़तरा लाहक़ है। इस के बावजूद एक ख़ुश आइंद बात ये है कि हनूज़ क़ानून आज़ाद है और क़त्ल-ए-आम के ज़िम्मेदारों को कहीं ना कहीं जवाबदेह होना पड़ रहा है।

गुजरात नसल कश फ़सादात के बाद जिस तरह से हक़ूक़-ए-इंसानी की तनज़ीमों ने बलवाइयों और इंतिज़ामिया के ज़िम्मेदारों को अदालतों में खींचा है और अदालतों ने इन मुक़द्दमात को जिस अंदाज़ से निमटा है इस से ये यक़ीन-ओ-उम्मीद पैदा होने लगे थे कि मुल्क में फ़सादाद तारीख में कहीं गुम हूजाएंगे मगर मुज़फ़्फ़र नगर फ़साद से ये ज़ाहिर होगया है कि ये सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ है बल्कि नफ़रत की आग भड़काने वाले अब भी सरगर्म हैं।

ये महसूस किया गया है कि गुजरात फ़सादात से दंगा-ओ-फ़साद का तरीक़ा बदल गया है, बलवाइयों ने इंसानी जानों के नु़कसान पहुंचाने को कम करदिया है मगर इमलाक(परिसंपत्तियों) को ज़्यादा नुक़्सान पहुंचाया है और अक़ललियतों को ख़ौफ़ज़दा करना शुरू किया है ताकि ये अपना सब कुछ छोड़कर नक़्ल-ए-मकानी पर मजबूर हूजाएं। एक और ख़ास तबदीली ये आई है कि फ़सादाद का मब्दा अब शहर नहीं रहे हैं बल्कि देही इलाक़ों में फ़साद फैलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि फ़सादात भड़क उठने के लिए तीन उमूमी मुहर्रिकात होते हैं। फ़सादात से क़ब्ल नफ़रत का माहौल गर्म किया जाता है और फिर फ़साद की चिंगारी लगाई जाती है और उस चिंगारी को हवा देने हुकूमत की आमादगी ज़रूरी होती है।

अगर इत्तिफ़ाक़ से कहीं कोई फ़साद फूट पड़े तो इस पर क़ाबू पाने के लिए हुकूमत को बमुश्किल 6 घंटे दरकार होते हैं मगर जब ये फ़सादात दिनों, हफ़्तों बल्कि महीनों तक भड़के रहते हैं तो ये समझ लेना चाहीए कि हुकूमत ख़ुद ऐसा चाहती है।

मुज़फ़्फ़र नगर का फ़साद एक मंसूबाबंद था और ख़ुद उत्तरप्रदेश की हुकूमत का भी ये मंसूबा था कि छोटे पैमाना पर फ़सादाद को भड़काया जाये मगर बाद में हालात इस के कंट्रोल से बेक़ाबू होगए। नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश का दौरा करने से दो माह क़ब्ल अमीत शाह को भेजा था। गाड़ियों की टक्कर में दो फ़िरक़ों के नौजवानों में हुए झगड़े का झूठा प्रोपगंडा करते हुए फ़साद को भड़काया गया और स्यालकोट के एक वाक़िये की वीडियो क्लिपिंग को इस्तिमाल करते हुए ये प्रोपगंडा किया गया कि अपनी बहन की इज़्ज़त बचाने वाले सचिन को मुस्लिम मजमा ने ज़द-ओ-कोब करके हलाक कर दिया है जबकि सचिन की बहन ने टेलीवीज़न पर ये वज़ाहत भी करदी थी कि इस झगड़े में हलाक होने वाले मुस्लिम नौजवान शाहनवाज़ से ना ही इस का मआशक़ा था और ना ही वो उसे छेड़ा करता था बल्कि वो एक अजनबी था। इस झगड़े के बाद एक खप पंचायत बेटी बचाओ-बहू बचाओ के नाम पर हुई जिस में नफ़रत को ख़ूब हुआ दी गई।

पंचायत से मुंतशिर होने वालों ने मुस्लिम बस्तियों में दाख़िल होकर तबाही मचाना शुरू कर दिया। स्यालकोट के वाक़िये की वीडियो क्लिपिंग को इस्तिमाल करते हुए नफ़रत फैलाने वाले बी जे पी के एमएल को कल गिरफ़्तार कर लिया गया जबकि ऐसा बहुत पहले ही होना चाहीए था।

अगर हुकूमत फ़ौरी हरकत में आती और असल वाक़िये की हक़ीक़त बयान करदेती और नफ़रत फैलाने वालों को गिरफ़्तार करलेती तो ये फ़साद लंबा नहीं खिंचता।

मुक़ामी लोगों ने बताया कि पुलिस ख़ामोश तमाशाई बनी रही और ये हक़ीक़त भी है चूँकि कहीं भी ना ही फायरिंग की गई और ना ही लाठी चार्ज किया गया।

हुकूमत एहतियाती इक़दामात करने में नाकाम रही और फिर फ़सादात भड़क उठने के बाद इस पर फ़ौरी कंट्रोल करने में भी नाकाम रही। फ़सादात के बाद हुकूमत को चाहिए था कि ना ही बचाओ के काम की और ना ही मुतासरीन को राहत पहुंचाने के इक़दामात किए जो कि हुकूमत का फ़र्ज़ है। इन फ़सादाद में 50,000 से ज़ाइद मुसलमान बेघर होगए हैं जो इस क़दर ख़ौफ़ज़दा हैं कि वो दुबारा अपने गांव वापिस जाना नहीं चाहते।

ये फ़सादात आइन्दा इंतिख़ाबात में वोटों के हुसूल की ख़ातिर करवाए गए थे ताकि राय दहिन्दों की ताईद मज़हबी ख़ुतूत पर हासिल की जाये। ब स पा की अपनी कमियों के बावजूद ये ख़ूबी रही कि उसने फ़सादात पर कंट्रोल किया था।

क़ानून इंसिदाद फ़िर्कावाराना तशद्दुद को लागू करने के ख़सूस में हुकूमत ने पहले जो बिल पेश किया था इस में फ़सादात में इंतिज़ामिया के इख़्तयारात को बढ़ा दिए गए थे जबकि हम चाहते थे कि इंतिज़ामिया को जवाबदेह बनाया जाये।

फ़सादात की सूरत में अपने फ़राइज़ से ग़फ़लत बरतने वाले और इख़्तयारात का बेजा इस्तिमाल करने वाले आफ़िसरान के ख़िलाफ़ तादीबी कार्रवाई की जाये और फ़सादात पर कंट्रोल के लिए तैनात फ़ौजी दस्ता के कमांडर के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाये।

हमारी ये तजवीज़ थी कि अवामी फ़राइज़ की अंजाम दही में नाकाम अफ़िसरों को पाँच साल की सज़ा रखी जाये ताकि ये ओहदेदार अपने ख़िलाफ़ इमकानी तादीबी कार्रवाई के ख़ौफ़ से फ़सादात में बलवाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से इजतिनाब करने सियासी दबाव को क़बूल ना करे।
(सियासत के जिगर हॉल में दी गयी हर्ष मंदर की त़करीर का इ़क्तेबास)

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