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नफरत की हवाओं के आगे भी बहुत कुछ रह जाता है – अभिषेक उपाध्याय

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अब्दुल हमीद अंसारी। siasat hindi

“अभिषेक उपाध्याय की सोच ”
पहली बार पाकिस्तान। कई मुल्क जा चुका हूं, पर कभी कुछ नही सोचा। पर आज..। बहुत कुछ है सोचने को। बहुत कुछ…। हालांकि ये भी सच है कि अब जा रहा हूं तो वे वजहें बेहद कम रह गई हैं, जो मुझे बेतरह खींचती हैं। अब तो वे चंद ही गिने चुने लोग होंगे, जिनसे तकरीबन रोज़ ही ख्वाबों में गुफ्तगू हो जाती है। न परवीन आपा रहीं। न फैज़ साहब। फराज़ साहब भी गुज़र गए। दिल में कितनी तमन्ना थी कि काश कभी मिलूं तो पूछूं? फराज़ साहब, आखिर कैसे लिखते हैं इतनी प्यारी इतनी खूबसूरत गज़ल-
‘सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।’
आखिर कहां से आता है ये हुनर कि कह सकें?
‘सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं।’
अब तो मंटो की रफ़ाकत भी किसे नसीब होगी? हां, इतना जरूर जानता हू्ं कि उसकी कब्र में खुदा से भी बड़ा अफसानानिगार पैर पसार कर सोया हुआ है। मल्लिका-ए-गज़ल फरीदा खानम हैं। लाहौर में रहती भी हैं। उधर से गुज़रूंगा भी। मगर कहां मिलना हो पाएगा? सहाफियत की मज़ीद मसरूफियतो में ये मौका भी कहां मयस्सर होगा! हबीब जालिब को मैं इंकलाबी अदब के सबसे बड़े नामों में शुमार करता हूं। जितना पढ़ा लिखा है, उसमे्ं बस दो ही नाम समझ में आते हैं। या तो हबीब जालिब, या फिर पाश। दिन में कितनी ही दफा जुबां पर तैर जाती है जालिब साहब की ये लाइनें- ‘ऐसे दस्तूर को/सुब्हे बेनूर को/मैं नही मानता/मैं नही मानता/मैं नही मानता।’ हबीब जालिब भी अब बस किताबोें में बाकी हैं।
मगर फिर भी। इसके बाद भी। बहुत कुछ है। जो उस जम़ीन के हिस्से है। नफरत की हवाओं के आगे भी। बहुत कुछ रह जाता है। बहुत कुछ बच जाता है। उम्मीद है, कि सियासत की गर्म हवाओं के बीच उस ‘कुछ’ से भी वास्ता जरूर होगा। ये मंज़र भी देखकर लौटू्ंगा। शुक्रिया पाकिस्तान, देर रात सही, वीज़ा देने के लिए।

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