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नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के बाबरकत इब्तिदाई दिन

(डाक्टर मोहम्मद उल्लाह)कुदरती वसायल के फुकदान के बावजूद मक्का इस तिकोन के दूसरे हिस्सों यानी मदीना और तायफ में सबसे ज्यादा तरक्कीयाफ्ता था। उनमें से सिर्फ मक्का में एक शहरी रियासत कायम थी जिसका इंतजाम पुश्त दर पुश्त से रायज कबाइ

(डाक्टर मोहम्मद उल्लाह)कुदरती वसायल के फुकदान के बावजूद मक्का इस तिकोन के दूसरे हिस्सों यानी मदीना और तायफ में सबसे ज्यादा तरक्कीयाफ्ता था। उनमें से सिर्फ मक्का में एक शहरी रियासत कायम थी जिसका इंतजाम पुश्त दर पुश्त से रायज कबाइल के सरदारों पर मुश्तमिल एक कौंसिल के सुपुर्द था। जिनके अख्तियारात की तकसीम बिल्कुल वाजेह थी।

अहले मक्का को तिजारती काफिलों की कयादत का भी एजाज हासिल था और उन्होंने पड़ोसी रियासतों यानी ईरान, सीरिया और हबशा से खुसूसी तिजारती रियायतें हासिल कर रखी थी और तिजारती काफिलों के रास्ते में आबाद कबाइल से भी उनके मुआहिदे थे जिनके बाइस उनके तिजारती काफिले बेखौफ दूसरे मुल्क आते जाते और इम्पोर्ट का एक बाजाब्ता सिलसिला कायम था। वह दूसरे मुल्कों से आने वालों को अपने और हलीफ अरब कबाइल के इलाकों से बहिफाजत गुजारने के लिए दस्ते भी फराहम करते।

तहरीरी रिकार्ड रखने या अपने ख्यालात को महफूज रखने में कुछ दिलचस्पी न होने के बावजूद अहले अरब फुनूने लतीफा, मसलन शायरी, इल्मी बहस-मुबाहिसे, दास्तान गोई के बहुत रसिया थे।

औरतों को आमतौर पर एहतराम का दर्जा हासिल था और वह न सिर्फ जायदाद रखने का हक रखती थीं बल्कि शादी के लिए उनकी रजामंदी भी जरूरी समझी जाती थी और उन्हें यह भी अख्तियार था कि अगर वह चाहें तो शादी की शर्तों में शौहर से तलाक हासिल करने की शिक भी शामिल करा सकती थी।

बीवी तलाक की सूरत में दूसरी शादी कर सकती थी। बच्चियों को जिंदा दफन करने की रस्म मौजूद तो थी। इस माहौल और हालात में हजरत मोहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की विलादत पांच सौ उनहत्तर ईसवीं में हुई। आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के वालिद हजरत अब्दुल्लाह का आप की विलादत से कुछ हफ्ता पहले इंतकाल हो गया जिसपर आप के दादा ने आप की परवरिश अपने जिम्मे ले ली। उस जमाने के दस्तूर के मुताबिक आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) को दूध पिलाने के लिए मक्का के देही इलाकों की एक खातून के सुपुर्द किया गया। जहां आप ने कई साल गुजारे।

तमाम सीरत निगारों का इत्तफाक है कि आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) बच्चे की हैसियत से अपनी रजाई वालिदा की सिर्फ एक छाती से दूध पीते जबकि दूसरी अपनी रजाई भाई के लिए छोड़ देते।

जब आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के दूध की मुद्दत पूरी हो गई तो आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) अपने घर वापस आ गए और आप की वालिदा हजरत आमना (रजि0) का अचानक इंतेकाल हो गया और आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) वालिदा की शफकत भरी गोद से महरूम हो गए जबकि वापसी पर आप को शफीक दादा के इंतेकाल की सूरत में एक और अजीम सदमा से दोचार होना पड़ा।

आठ साल की उम्र तक एक के बाद एक सदमों के बाद आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) को चचा अबू तालिब ने अपनी सरपरस्ती में ले लिया। अबू तालिब का दिल बहुत बड़ा था मगर आप तंगदस्ती की जिंदगी गुजार रहे थे।

इन हालात के बाइस आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) को छोटी उम्र में ही रोजी रोटी के लिए निकलना पड़ा। सिर्फ दस बारह साल की उम्र में अपने चचा के साथ सीरिया का सफर किया जो एक तिजारती काफिला लेकर वहां जा रहे थे। अबू तालिब के किसी और सफर का तजकिरा नहीं मिलता लेकिन मक्का में एक दुकान खोलने के हवाले से कुछ सबूत मिलते हैं। पच्चीस साल की उम्र तक आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) शहर में अपनी दयानतदारी, रास्तगोई और हुस्ने किरदार के बाइस पूरी तरह मशहूर हो चुके थे।

शहर की एक अमीर बेवा हजरत खदीजा (रजि0) ने अपना माल सीरिया ले जाने के लिए आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की खिदमात मुनासिब मुआवजे पर हासिल की जिसमें हजरत खदीजा को मामूली से कई गुना ज्यादा मुनाफा हुआ। उस दौरान आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की दीगर शख्सी खुसूसियात से मुतास्सिर होकर हजरत खदीजा ने आप को शादी की पेशकश की।

उस वक्त हजरत खदीजा की उम्र चालीस और बाज दीगर रिवायात के मुताबिक अट्ठाइस बरस थी (तिब्बी हावाले से अट्ठाइस साल की उम्र ज्यादा करीन कयास नजर आती है क्योंकि इसके बाद आप ने पांच बच्चों को जन्म दिया) यह रिश्ता बहुत खुशगवार साबित हुआ। बाद के कुछ बरसों में हम देखते हैं कि आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने हिबाजा (यमन) के मेले में शिरकत की और हजरत इमाम अहमद बिन हंबल की रिवायत के मुताबिक कम से कम एक बार अब्दुल कीस के मुल्क (बहरीन/ बहरैन ओमान) का सफर भी किया और इस बात के पुख्ता शवाहिद मौजूद है कि आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) का सफर दाया (ओमान) के मशहूर मेले के लिए था, जहां इब्ने अल कल्बी के मुताबिक (बहवाला महीर अज इब्ने हबीब) चीन, हिन्द और सिंध (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान) ईरान, बिलाद मशरिक और मगरिब के ताजिर खुश्की और समुन्दरी सफर करने हर साल आया करते थे।

मक्का में आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के एक कारोबारी शरीककार का भी जिक्र मिलता है। उस शख्स का नाम सायब था। उसका बयान है कि ‘‘हम बारी-बारी से काम करते थे अगर वह आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) काफिला लेकर जाते तो वापसी पर उस वक्त तक अपने घर में दाखिल न होते जब तक मेरे साथ हिसाब-किताब मुकम्मल न कर लें और अगर मैं काफिला लेकर जाता तो वापसी पर आप मेरी खैरियत दरयाफ्त फरमाते और मुझे सौंपे गए सामाने तिजारत के बारे में कभी इस्तिफसार न फरमाते।’’

गैर मुल्की ताजिर अक्सर सामान लेकर मक्का आते जाते थे। एक दिन का जिक्र है कि एक यमनी ताजिर (जिसका ताल्लुक कबीला जुबैद से था) मक्का के कुछ लोगों के खिलाफ शेअरो में फरियाद करता पाया गया जिन्होंने उसके माल की तयशुदा कीमत देने से इंकार कर दिया था। वह शाकी था कि न सिर्फ उसका माल लूटा गया बल्कि किसी ने उसकी मदद भी नहीं की। आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के चचा और कबीला के सरदार जुबैर को यह फरियाद सुनकर सख्त सदमा पहुंचा।

उन्होंने मक्का के अकाबिरीन का इजलास बुलाया और हलफ अल फुजूल के नाम से मजलूमों की मदद का एक मुआहिदा किया। उस मुआहिदे की एक शिक यह थी कि मजलूमों की मदद की जाएगी। चाहे उनका ताल्लुक मक्का से हो या मक्का से बाहर से हो। आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) इस निजाम के एक सरगर्म रूक्न बन गए। आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) बाद में भी फरमाया करते थे कि मैं मुआहिदे में शामिल रहा हूं और मैं ऊंटों के एक गला के एवज भी अपना यह अहद तर्क करने को तैयार नहीं हूं।

आज भी अगर किसी ने मुझे इस वादे के हवाले से पुकारा तो मैं उसकी मदद के लिए आगे बढ़ूंगा।

————–बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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