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नये आर्मी प्रमुख पर सियासी घमासान, कांग्रेस-लेफ्ट ने उठाए सवाल

नई दिल्ली। लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को जब सरकार ने नया आर्मी चीफ नियुक्त किया तो अन्य पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं।

दरअसल, बिपिन रावत से ज्यादा वरिष्ठ दो अधिकारी भी आर्मी चीफ बनने की दौड़ में थे। अब इसी मुद्दे पर विरोधी पार्टियां सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर सीनियर अधिकारियों को दरकिनार कर बिपिन रावत को आर्मी चीफ क्यों बनाया गया।

सामान्य तौर पर सेनाओं के चीफ वे बनाए जाते हैं जो वरिष्ठता की रैंकिंग में सबसे ऊपर होते हैं, जैसा कि नए वायुसेना प्रमुख बीरेंद्र सिंह धनोवा के मामले में हुआ। उनकी नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर हुई है लेकिन थल सेना प्रमुख बिपिन रावत की नियुक्ति में वरिष्ठता की सरकार ने अनदेखी कर दी।
बिपिन रावत की आर्मी चीफ के पद पर नियुक्ति का कांग्रेस ने विरोध किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया, ‘आर्मी चीफ की नियुक्ति में वरिष्ठता का सम्मान क्यों नहीं किया गया? क्यों लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी और लेफ्टिनेंट जनरल हारिज को दरकिनार किया गया?’

वर्तमान आर्मी चीफ दलबीर सिंह सुहाग के बाद पूर्वी आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्सी सबसे ज्यादा सीनियर सेनाधिकारी हैं। वरिष्ठता के मामले में उनके बाद दक्षिणी थल सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पी एम हारिज आते हैं। फिर इसके बाद बिपिन रावत का नंबर आता है। लेफ्टिनेंट जनरल बख्शी ने 1977 के दिसंबर में आर्मी ज्वाइन की थी। लेफ्टिनेंट जनरल हारिज 1978 के जून में सेना के जवान बने थे। बिपिन रावत 1978 के दिसंबर में गोरखा राइफल्स में शामिल हुए थे।

सीपीआईएम नेता मोहम्मद सलीम ने इस नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘हलांकि सेना के मुद्दों पर हम कभी टिप्पणी नहीं करते लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार देश की बड़ी परंपरा को बदलने की कोशिश कर रही है।’

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