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नशा करना फैशन है या लाचारी

भारत शीघ्र ही 69वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी मे जुटा है। यह तैयारी भारत के दिल आर्थात दिल्ली मे आसानी से देखने को मिल जाती है। दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस जिसको भारतवासी अच्छी तरह जानते हैं। यह 41,500 वर्ग किलोमीटर मे फैला दिल्ली का सबसे बड़ा व्यवसायिक एवं व्यापारिक केन्द्र भी है। इसका निर्माण 1933 मे 4 साल की अवधि मे पूरा हुआ। इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था। इस मार्केट का डिजाइन डब्लू एच निकोल और टॉर रसेल ने बनाया था। यह मार्केट अपने समय की भारत  की सबसे बड़ी मार्केट थी। अपनी स्थापना के इतने वर्षों बाद भी यह दिल्ली में खरीदारी का प्रमुख केंद्र है। आपको भारत के इतिहास से लेकर वर्तमान तक की जानकारी देने वाली बहुत अच्छी किताबें भी यहाँ मिल जाएंगी। इसके आलावा रोजमर्रा मे काम आने वाले सभी आवश्यक सामान यहाँ आसानी से मिल जाते हैं। जिस कारण यहाँ लोगो का आना जाना हर समय लगा रहता है और रात के समय तो इस मार्केट की खूबसूरती देखते ही बनती है। पर इन तमाम खूबसूरती के बीच यहां मौजुद हैं कई ऐसे लोग जो फुटपाथ पर पड़े रहते हैं, और भीख मांग कर अपना जीवन चला रहे हैं। ऐसे लोगो की तादाद बहुत ज्यादा है पर भीख मांगने वालो की इस भीड़ मे जात-पात, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म का भेदभाव नज़र नहीं आता। वो सब सिर्फ एक ही नाम से जाने जाते हैं ओर वह है भिखारी28 वर्षिय, चित्रा राजीव चौक मेट्रो स्टेशन गेट नम्बर 2 के पास अपने बच्चों के साथ भीख मांगती हुई है बताती है 2 साल पहले मैं अपने पहचान वाले व्यक्ति के बुलाने पर काम के सिलसिले मे यहाँ आई थी लेकिन बहुत कोशिशो के बाद भी जब मुझे कोई ढंग का काम नही मिला तो औरों की तरह पेट की आग बुझाने के लिए मैंने भी इस जगह पर भीख मांगना शुरु कर दिया| कनॉट प्लेस मे आपको ऐसे बहुत सी चित्रा मिल जाएँगी जो यहाँ काम के सिलसिले मे ज़रुर आई थीं लेकिन काम न मिलने के कारण भीख मांगना पहले उनकी मज़बूरी और अब आदत बन गई है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जो मेहनत करके इसी मार्केट मे दो वक्त की रोटी कमाने की कोशिश मे हर रोज जिंदगी से जंग लड़ते इटंरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कनॉट प्लेस मे एक तरफ तो रोज़ कई करोड़ो का कारोबार होता है, वहीं दुसरी तरफ कई बच्चे और महिलाएँ पेट कि आग बुझाने के लिए कई छोटे मोटे काम करके दो वक्त की रोटी कमाने की कोशिश करते है। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से लेकर कनॉट प्लेस तक ऐसे बच्चे मिल जाते हैं जो या तो भीख मांगते हैं या फिर छोटी मोटी वस्तुएँ बेचकर कुछ पैसे कमाने की कोशिश करते हैं। हालांकि ये अफसोस की बात है कि इनमे से अधिकतर बच्चे मेहनत से कमाए हुए अपने पैसों को नशे की लत मे पड़कर पैसों के साथ आपना जीवन भी गंवा देते हैं। युवा भी इस दौड़ मे पीछे नही हैं दिन भर यहाँ छोटी छोटी दुकानो पर मेहनत करने वाले 20-25 साल के अधिकतर नौजवान सूरज ढलते ही नशे की लत मे धुत हो जाते हैं। 23 वर्षीय, आकाश जो नशा करता है कहता है नशा करने से मुझे ऊर्जा मिलती है जिससे पूरे दिन काम करने कि क्षमता बढ़ जाती है। नशे के लिए ज़्यादा मेहनत नही करनी पड़ती, मुश्किल से 20 से 30 रुपये मे नशे का सामान मिल जाता है |जब इन सबके बारे स्थानिय निवासी अभिषेक से पूछा गया कि नशे का कारण क्या है तो वह बताते है कि नशा का व्यापार खुल्ले आम होता है, बहुत से नियम ओर कानून है फिर भी नशा बेचने वाले बेच रहे हैं ओर खरीदने वाले खरीद रहे हैं इस संबध मे संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि भारत मे 20 लाख लोग नशा करते हैं इनमे से अधिकतर संख्या युवओं की है। जाहिर है कि ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और इस ओर हम सबको इस ओर प्रयास करने की आवश्यकता है इसी प्रयास के तहत जब मैने नशा करने वाले लोगो की तस्वीरें लेने की कोशिश की तो उन्होने तसवीरें लेने से मुझे रोक लिया और जो तस्वीरें पहले ली थी वह भी मिटा दी गयी। एक स्थानीय ने मुझसे रुकते हुए कहा “क्यों आप इन लोगों का सुख चैन छीन रहे हो,यह लोग बस लाचार दिखते हैं, इनके पास पास खाने पीने कि कोई कमी नही है। यह लोग सुबह नशे मे धुत रहते है और दोपहर और रात का खाना उनको गुरुद्वारा बंगला साहिब से मिल जाता है। बस रात को सोने कि दिक्कत होती है वो भी बारिश मे। उनको ठंड मे ज़्यादा परेशानी नही होती क्योंकि उनको हर बार कोई नो कोई कंबल बाँट कर अब सवाल यह अठता है कि भीख माँगना शौक है या मजबूरी ? और नशा करना फैशन है या लाचारी? इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब दुनिया भर की निगाह हर साल कि तरह इस साल भी भारत की राजधानी दिल्ली और दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस पर होगी उसी समय 1.25 करोड लोगों का नेतृत्व करने वाले भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देकर राष्ट्र और दुनिया को संबोधित कर रहे होगें। तब कनॉट प्लेस के किसी फुटपाथ पर देश का भविष्य नशे की हालत में गहरी नींद मे सो रहा होगा।

 

 

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रितेश कुमार सिंह
(लेखक ने चरखा डेवलंपमेंट कम्यूनिकेशन नेटवर्क मे इसी वर्ष पत्रकारिता मे एक महिने का इंटर्नशिप किया है।)

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