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नहीं थम रहा आंसुओं का सैलाब

देहरादून, 30 जून: पानी का सैलाब भले ही तबाही मचाकर गुजर गया हो, लेकिन आंसुओं का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और दिगर कई मुकामात पर हाथ में तश्वीर लिए हजारों लोग अपनों की तलाश में भटक रहे हैं तो तमाम घरों मे

देहरादून, 30 जून: पानी का सैलाब भले ही तबाही मचाकर गुजर गया हो, लेकिन आंसुओं का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और दिगर कई मुकामात पर हाथ में तश्वीर लिए हजारों लोग अपनों की तलाश में भटक रहे हैं तो तमाम घरों में खुशखबरी की आस अभी बची है।

उत्तराखंड की हुकूमत 822 लोगों की मौत के आंकड़े और तीन हजार के लापता होने की तादाद पर टिकी है, जबकि रियासत असेम्बली के सदर गोविंद सिंह कुंजवाल ने मरने वालों का आंकड़ा दस हजार से ऊपर जाने के इम्कान जताए है। उन्होंने कहा, हाल के गढ़वाल दौरे के वक्त उन्हें मरने वालों की तादाद् पांच हजार तक होने का एहसास हो गया था, लेकिन अब हासिल हुई इत्तेला से लग रहा है कि यह आंकड़ा दस हजार से ऊपर जा सकता है।

खराब मौसम के बावजूद इस इलाके में बचाव का काम जारी रहा। हफ्ते को बदरीनाथ व कुछ दूसरे इलाकों से 1313 लोग निकाले गए। डेढ़ हजार लोग अभी भी फंसे हुए हैं।

तबाही वाले इलाके से काफी हद तक तीर्थयात्रियों को निकालने के बाद हुकूमत का ध्यान मुकामी आबादी की ओर गया है लेकिन खराब मौसम कुछ खास नहीं करने दे रहा। रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और पौड़ी गढ़वाल जिलों के बर्बाद हुए 672 गांवों में मौसम खराब होने के सबब हेलीकॉप्टर से राहत का सामान नहीं गिराया जा रहा है। रुद्रप्रयाग के उखीमठ ब्लॉक के करीब सौ गांवों में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है।

इन गांवों तक पहुंचने का सड़क का रास्ता खत्म हो गया है। कई गांव अपनी पहचान खो चुके हैं और तमाम किसानों के पहाड़ों की तलहटी में वाकेए खेत सैलाब में बह गए हैं या उनमें मलबा भर गया है। रुद्रप्रयाग का विजयनगर कभी एक बड़ा गांव हुआ करता था लेकिन अब उससे होकर नदी बह रही है।

खानदान घर-खेत-मवेशी गंवाने के बावजूद भी गाँव वाले अपना ठिकाना छोड़ने को तैयार नहीं। वह वहीं पर रहकर अपनी जिंदगी को गुजारना चाह रहे हैं। हुकूमत पर अब ऐसे गाँव वालो की जिंदगी को पटरी पर लाने की चुनौती है।

लापता लोगों की तादाद और मरने वालो की तादाद दिल दहलाने वाली है। तबाही के 13 दिन बाद भी जो लोग नहीं लौटे हैं और उनकी कोई खबर नहीं है, उनके घरवाले भी अब भारी मन से उन्हें हादिसे का शिकार मानने को मजबूर हैं।

राहत कैंपो और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुके लोग अब अपने लापता रिश्तेदारों के न होने होने की बात कुबूल करने लगे हैं। वे अब केदारनाथ में आखिरी रसूमात से पहले लाशों के खींचे जा रही तश्वीरों और पहचान वाजेह करने वाली अशिया को देखने के खाहिशमंद हैं, जिससे उन्हें अपने रिश्तेदारों की सही शनाख्त हो सके।

केदार घाटी इलाके में अभी भी हजारों लाशे जहां-तहां पड़े हैं। तमाम लाशें के मलबे में दबे होने के इम्कान है। इलाके का माहौल लाशों से पैदा हो रही बदबू से बुरी तरह खराब हो चुका है। चूंकि सभी फंसे लोगों को यहां से निकाला जा चुका है और आबादी वहां बची नहीं है, इसलिए महामारी की जद में आसपास बचे गांवों के लोग ही आ सकते हैं। हफ्ते को सिर्फ तीन नामालूम लाशों का आखिरी रसूमात हो सका।

इंसानी नुकसानात के इलावा हुकूमत बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान को फिर से खड़ा करने की चुनौती से भी जूझ रही है। जानकार मान रहे हैं कि तमाम सहूलियात के बावजूद उत्तराखंड को पहले जैसे माहौल में आने में कई साल लग सकते हैं।

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