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नारी बेचारी या लाचार नहीं, आओ अपनी सुरक्षा और हक़ की लड़ाई खुद लड़ें : सहेली

मेवात के डीगरहेडी कांड पर महिलाओं ने निकाली अपनी भडास, कहा ऐसी घटनायें, सरकारों और पुलिस के दावों की पोल खोलती है

मेवात(हरियाणा)  5 सितंबर : गांव डींगरहेड़ी की दोहरी बलात्कार और दोहरी हत्या की घटना निसंदेह ही न केवल दिलदहलाने वाली है बल्कि पूरे समाज, पुलिस, पूरी व्यवस्था और सरकार को शर्मिंदा करने वाली है. मेवात की बेटियों के साथ बलात्कार जैसी घटित घटना पर आज पूरे समाज को शर्म अणि चाहिए, जिस देश में जहाँ बेटियों को मारने से बचाने और पढने के लिए करोडो रुपये खर्च किये जा रहे है. करोडो रूपए ख़र्च किये जा रहे है महिलाओं और बेटियों की रक्षा,सुरक्षा के लिए सार्वजनिक जगहों पर कैमरा लगाने में ऐसे में मेवात की झंझोर देने वाली घटना कई सवालों को जन्म और महिलाओं की सुरक्षा में गढ़े जाने वाले सरकारों और पुलिस के कई दावों और कानूनों की पोल खोलती है.

डींगरहेड़ी कांड पर सहेली संस्था की राष्ट्रीय अध्यक्षा सहेली शबाना खान ने कहा कि शर्म आती है आज़ादी का ऐसा जश्न मनाते हुए जहाँ की बेटियां और महिलाएं आज़ादी के 70 साल बाद आज भी अपने साथ घट रही आपराधिक, मानसिक, शहरीरिक, सामाजिक, आर्थिक घटनाओं से आज़ाद नहीं है. और उस से भी ज्यादा शर्म तब आती है जब एक तरफ भारत की बेटियां और महिलाएं हर फील्ड में अपना लोहा मनवा रही है और लगातार देश के मान और शान में नया इतिहास लिख रही है वही आज के रोशन ख्याल दौर में भी समाज में ऐसे तथाकथित जिम्मेदार लोग गैर सामाजिक तत्त्व के रूप में मौजूद है जो महिलाओं और बेटियों को पर्दों और हदों में रख ने की वकालत करते हुए देश में घट रही महिलाओं और बेटियों के खिलाफ रेप जैसी शर्मनाक घटनाओ को सुन कर शर्मसार होने की बजाय उनके पहनावे, लिपस्टिक लगाने या फिर उनका देर रात को बाहर जाने को ही उल्टा जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला छुड़ाते आये है है.
लेकिन यहाँ में उन लोगों से पूछना चाहती हु की मेवात की पीड़िताओं ने कोनसे छोटे कपडे पहने थे, कोन सी लिपस्टिक लगा राखी थी या फिर वो कोन सा रात को घर से बाहर थी. जब उन्होंने आपकी दकियानूसी सोच के विपरीत कुछ भी नहीं किया था तो फिर क्यों उन बेगुनाहो के साथ इतना घिनोना अपराध हुआ। आखिर किस बात की सजा उन्हें मिली? ऐसी महिलाविरोधी सोच वालों के लिए मैं आज फिर सभी महिलाओं की और से बता देना चाहती हु की महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध के लिए जिम्मेदार न उनके कपडे है न ही उनका रात को घर से बाहर जाना। अब वो समय आ गया है जब खुद महिलाओं को अपने विरुद्ध हर छोटी बड़ी घटनाओ के खिलाफ असहिंष्णुत होना होगा। क्योंकि हम नारी है. बेचारी या लाचार नहीं. आओ अपनी सुरक्षा और हक़ की लड़ाई खुद लड़े।

सहेली नीलू खान ने अपने विचार व्यक्त करते हुऐ कहा कि इस तरह की घटनाओं के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वो है समाज के भीतर भीतर पनप रही आप जैसी महिला विरोधी छोटी और घाटियां सोच. जो उटपटांग बयान बाजी देने से पहले एक बार भी अपनी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी के बारे में नहीं सोचते है साथ ही इसके लिए जिम्मेदार वो मीडिया भी है जो घंटों घंटों नग्न बाबाओ के नृत्य अपने चैनल पर चला सकते है परंतु किसी बेक़सूर को न्याय दिलाने के लिए नहीं। अगर कोई जिम्मेदार है तो वो है वो नेता और अभिनेता जो गैरजरूरी मुद्दों पर तो एकत्रित होकर असहिंष्णुत हो जाते है परंतु महिलाओं और बेटियों की इज़्ज़त और आबरू को बार बार तार तार होते देख और सुन पल भर भी के लिए भी असहिंष्णुत नहीं होते है। जिस देश में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की मुहीम चलायी जाती है उसी देश में दिन रात बेटियों के साथ बलात्कार जैसे घिनोने अपराध बढ़ रहे है. आखिर कब गवर्नमेंट कब कोई कड़े कदम ऐसे अपराधियों के खिलाफ उठाएगी ? अफ़सोस 2012 के बाद भी सरकारों और पुलिस की आँखे नहीं खुली।

सहेली सुमन ने कहा कि कहाँ है वो लोग जो अब तक बेटियों के साथ बलात्कार और छेड़-छाड़ के अपराधों में उनके कपडे और रत में घर से निकलने को जिम्मेदार ठहराते है. उनसे पूछना चाहती हु की मेवात बेटियों के साथ हुए कुकर्म के लिए वो अब किसे जिमेदार ठेरायेंगे। क्योंकि न तो उन बेगुनाहो ने छोटे कपडे पहने थे नहीं वो रत को घर से बाहर निकली थी। अपनी घटिया, नकरात्मक सोच का परिणाम देना बंद करे और महिलाओं और बेटियों के खिलाफ हो रहे है जघन्य अपराधों की रोक की दिशा में कुछ करे.

सहेली वासिया ने कहा कि दामिनी के दोषियों को फांसी की सजा तो डींगरहेडी में घटी हत्या एवं सामूहिक बलात्कार की घटना के दोषियों को क्या सजा होनी चाहिए ? दामिनी को न्याय किसी सरकार या अदालत नहीं दिलाया उसे न्याय दिलाने वाला जागरुक युवा एवं छात्र छात्राओं का आनदोलन था । पूरे देश की आवाज थी कि दोषियों को फांसी हो । बरना दामिनी की चीखें अदालत की फाइलों में दबकर रह जाती । तो फिर आज देश का युवा क्यों खामोश है । क्यों फिर से हरयाणा प्रदेश के जिला मेवात के गांव में ऐसी शम्र नाक घटना घटी जिसमे दो बेटियों के साथ हैवानियत हुई

सहेली आयशा खान का कहना था कि बेटियों के हुकूक की बातें करने वाले वो लोग अब क्यों चुप हैं…? क्या पीड़िता का धर्म बदल जाने से इन्साफ़ की गुहार में भी बदलाव आ जाता है…? क्या ये बच्चियां देश की बेटी नहीं थीं…?
ऐसे हजारों हैं लेकिन जवाब धर्म विशेष पर आकर थम जाता है… आखिर ऐसा क्यों…? आज आपकी आंखों में आंसू क्यों नहीं हैं…? आज आपके होठों पर नारों की जगह धागे क्यों बंधे हैं…?

सहेली कृतिका त्रिपाठी का कहना था कि सरकारों और पुलिस की लापरवाही ही ऐसे मामलों में आरोपियों के हौसले बुलंद करते है। हमारी सरकार और पुलिस को महिलाओं और बेटियों के सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील होने की जरुरत है|

 

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