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नेक सोहबत नेक बनाती है

क़ुदरत ख़ुदावंदी ने इंसान को मुख़्तलिफ़ आदात-ओ-अत्वार पर पैदा किया और इस की तबीयत के अंदर तनव्वो का ऐसा माद्दा वदीअत किया, जिस से इंसान दीगर हैवानात से मुमताज़ है। गोया दूसरे अलफ़ाज़ में ये कहा जा सकता है कि इंसानी तबीयत को क़रार नहीं, व

क़ुदरत ख़ुदावंदी ने इंसान को मुख़्तलिफ़ आदात-ओ-अत्वार पर पैदा किया और इस की तबीयत के अंदर तनव्वो का ऐसा माद्दा वदीअत किया, जिस से इंसान दीगर हैवानात से मुमताज़ है। गोया दूसरे अलफ़ाज़ में ये कहा जा सकता है कि इंसानी तबीयत को क़रार नहीं, वो कभी किसी चीज़ से मुतास्सिर होती है तो कभी किसी से मुतनफ़्फ़िर। साथ ही ये बात भी ग़ौर करने की है कि इंसान तन्हाई बेज़ार होता है, इस को ज़रूरत होती है इन चीज़ों की, जिस से इस का दिल बहुल्य और इस को शादमानी मयस्सर हो। अपने इस सामान तसल्ली के लिए वो कभी दोस्तों और यारों के साथ ज़िंदगी बसर करता है तो कभी खेल कूद के ज़रीया अपनी तन्हाई की वहशत को दूर करता है और ये बात भी अज़हर मन अश्शम्स है कि हक़ जल मज्दा की क़ुदरत कामला ने इंसान की फ़ित्रत में तास्सुर का ऐसा माद्दा रखा है कि कभी वो किसी के हुस्न-ओ-जमाल से मुतास्सिर होता है तो कभी किसी के आदात-ओ-अत्वार या अंदाज़-ओ-किरदार से। ये तास्सुर की सिफ़त कभी इंसान को संवारती है तो कभी फ़साद-ओ-बिगाड़ के रास्ता पर लाखड़ा करती है। इसी लिए फ़ारसी का मशहूर मक़ूला है सोहबत सालिह कन्ना सालिह कुंद। सोहबत ताला कन्ना ताला कुंद। नेक सोहबत नेक बनाती है, बुरी सोहबत बुरा बनाती है। और बद सोहबत ऐसी चीज़ है, जो शरीफ़ ज़ादों, उल्मा और बुज़ुर्गों की औलाद-ओ-अख़्लाफ़ को भी बिगाड़ देती है, जो अपने इस्लाफ़ के लिए बदनुमा दाग़ और इस से बढ़ कर बदनामी का बाइस बनते हैं। इस के बरख़िलाफ़ नेक सोहबत एक बदकिर्दार को ख़ुदातरस, मुत्तक़ी और परहेज़गार बना देती है। अच्छे किरदार के हामिल अफ़राद की सोहबत इख़तियार करने और बदखु़ल्क़-ओ-बदकिर्दार अश्ख़ास की सोहबत से बचने के लिए क़ुरआन-ओ-संत, सहाबा किराम-ओ-ताबईन के फर्मो दात-ओ-इर्शादात ने बड़ी रहनुमाई फ़रमाई। इरशाद रब्बानी है ए ईमान वालो! अल्लाह से डरो और जो लोग दीन के सच्चे-ओ-पक्के हूँ उन के साथ रहो। अल्लाह ताली ने सलिहा-ए-की बजाय सादिक़ीन का लफ़्ज़ इख़तियार फ़रमाकर आलम-ओ-सालिह की पहचान बतला दी कि सालिह सिर्फ वही शख़्स हो सकता है, जिस का ज़ाहिर-ओ-बातिन यकसाँ हो और जो नीयत-ओ-इरादा का सच्चा और क़ौल-ओ-अमल का पक्का हो। एक जगह अल्लाह ताली अपने महबूब नबी को हुक्म देता है ए नबी! अपने आप को रोके रखिए उन लोगों के साथ, जो अपने रब को सुबह-ओ-शाम याद करते हैं। इस आयत में बवास्ता नबी उम्मत को ये तालीम दी गई है कि हम दीनदार-ओ-इताअत शिआर लोगों की सोहबत इख़तियार करें।
नबी करीम सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम ने अपने इर्शादात में दोस्ती करने से क़बल दोस्त के अहवाल का जायज़ा लेने का हुक्म दिया है। हज़रत इबन अब्बास रज़ी अल्लाह अन्ना ने हम नशीनों से मुताल्लिक़ हुज़ूर अकरम सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम से दरयाफ़त किया कि हम जिन लोगों के साथ उठते बैठते हैं, इन में सब से अच्छा शख़्स कौन है?। हुज़ूर सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐसा शख़्स कि जिस का देखना तुम को अल्लाह की याद दिलाए और इस की गुफ़्तगु तुम्हारे इलम-ए-देन में तरक़्क़ी दे और इस का अमल तुम को आख़िरत की याद दिलाए। एक हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत उबूर ज़ीन नामी सहाबी से आप ने फ़रमाया क्या मैं तुम्हें इस दीन की असास और इस की रूह और इस का ख़ुलासा ना बताॶं, जिस के ज़रीया तुम दुनिया-ओ-आख़िरत की भलाई हासिल कर सको। आप ने फ़रमाया ज़िक्र-ओ-याद अलहि में मशग़ूल रहने वालों की मजालिस में बैठा करो। एक ईमान वाले और रासिख़ उल-अक़ीदा मुस्लमान की सोहबत का हुक्म देते हुए आप ने फ़रमाया किसी मॶमन ही की सोहबत इख़तियार करो और मुत्तक़ी लोगों को ही दस्तरख़्वान पर बल्लाॶ।
जहेज़ के भिकारी
Uआज मुस्लिम मुआशरा मैं जहेज़ के नाम पर लौट खसूट पूरी शिद्दत से जारी है। जहेज़ की लानत और रसूम-ओ-रिवाज की बिद्दतों से मुतास्सिर मुस्लिम मुआशरा की इस्लाह की कोई सूरत नज़र नहीं आती। चाहे अमीर हो या ग़रीब, आलिम हो या जाहिल, सभी का दामन इस बिद्दत से दागदार है, हर किसी ने जहेज़ को लाज़िमी और दीगर रसूमात बद को इबादतों का दर्जा दे रखा है। अख़लाक़ी हालत इस हद तक बिगड़ चुकी है कि हराम-ओ-हलाल की तमीज़ तक बाक़ी नहीं रही, दौलत की हिर्स-ओ-लालच ने मुस्लमानों को अंधा कर रखा है, जिन्हों ने अपनी मेहनत-ओ-क़ाबिलीयत के बलबूते पर दौलत हासिल करने की बजाय शादी जैसे फ़ित्री तक़ाज़ा को हुसूल दौलत का ज़रीया बना लिया है।
कहा जाता है कि जब इंसान में हया ख़तन हो जाती है तो वो बेग़ैरत बन जाता है। ये बात आज मुस्लमानों पर सादिक़ आती है, क्योंकि मुस्लिम मुआशरे में जहेज़ की लानत का आम होना ख़ुद इस बात का सबूत है कि आज मुस्लमान बेग़ैरती की हदों को पार करचुके हैं। आज हर कोई जहेज़ का भिकारी बना हुआ है और इस भीक को हासिल करने के लिए बेशुमार घरों पर दस्तक देता नज़र आता है। अफ़सोस कि एक आम भिकारी में इतनी तो ग़ैरत होती है कि वो ऐसी जगह भीक नहीं मांगता, जहां उसे भीक मिलने की उम्मीद ना हो, लेकिन जहेज़ के ये भिकारी एक महबोर और परेशान हाल मुस्लमान से भी जहेज़ की भीक मांगने से बाज़ नहीं आते। जहेज़ के लिए वो कभी दस्तूर ज़माना की दहाई देते हैं तो कभी दरोग़ गोई के ज़रीया लड़की वालों को रिझाने की कोशिश करते हैं, या फिर अपने जहेज़ के मुतालिबात को वाजिबी साबित करने के लिए ये दलील देते हैं कि जब हम ने अपनी लड़की की शादी में जहेज़ और नक़द रक़म दी है तो अपने लड़के के लिए जहेज़ का मुतालिबा करने में क्या हर्ज है। ये तो वही बात हुई कि अगर किसी के घर डाका ज़नी हो तो वो भी दूसरे के घर डाका डाल सकता है। यही वो शैतानी सोनच है, जो आज जहेज़ के लालची और दौलत के हरीस मुस्लमानों को लुटेरों में तबदील करदिया है।
मुस्लिम मुआशरे में एक तबक़ा ऐसा भी है, जो बज़ाहिर अवाम में दीनदार और तक़वा पसंद कहलाता है, लेकिन इस के दिल में भी अपने लड़कों के लिए माल और जहेज़ की ख़ाहिश चुटकियां लेती रहती है। चूँ कि वो खुले आम अपनी ख़ाहिश का इज़हार नहीं करसकते, इस लिए वो साँप भी मर जाय और लाठी भी ना टूटे के मक़ूला पर अमल करते हुए ऐसा दौलतमंद घराना तलाश करते हैं, जहां से बन मांगे ही दिल की मुरादें पूरी हो जाएं।
आज निकाह के लिए लड़की वालों से नक़द रक़म, सोना, गाड़ी और मुख़्तलिफ़ क़ीमती अशीया जहेज़ के नाम पर तलब करना लड़के वालों ने अपना हक़ समझ रखा है। उन्हें इतना भी एहसास नहीं कि एक लड़की को बचपन से जवानी और फिर घर गृहस्ती के काबिल बनाने तक लड़की के वालदैन को कितनी मशक़्क़तें उठानी पड़ी होंगी।
क्या ये लड़की के वालदैन की बेलौस मुहब्बत नहीं, जिन्हों ने अपनी बेटी की बड़े ही लाड प्यार से परवरिश की?। क्या ये लड़की के वालदैन का ईसार नहीं, जिन्हों ने कसीर रक़म सिर्फ़ करके अपनी बेटी को तालीम-ओ-तर्बीयत से आरास्ता किया?। क्या ये लड़की के वालदैन की बेमिसाल क़ुर्बानी नहीं, जो अपनी लख़त-ए-जिगर को बगै़र किसी ज़ाती मुफ़ाद के सिर्फ अल्लाह के हुक्म पर एक अजनबी मर्द के हवाले करदेते हैं?।
लड़की के वालदैन की इस नाक़ाबिल फ़रामोश ईसार-ओ-क़ुर्बानी के लिए लड़के वालों को एहसानमंद और शुक्र गुज़ार होना चाहीए। इस एहसान का बदला सिवाए जवाबी एहसान के और कुछ हो ही नहीं सकता, लिहाज़ा उस की सूरत गिरी इस तरह हो सकती है कि कम अज़ कम शादी के दो तरफ़ा अख़राजात लड़का ख़ुद बर्दाश्त करे।

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